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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 696 में से

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पृष्ठ 530

( ४६८ )
प्राणशब्दनिर्दिष्टादधिकतया सत्यस्योपदेशः कथमवगम्यत
इति चेत्-“स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी
भवति” इति सत्यवेदित्वेनाति वादिनं तु शब्देन पूर्वस्मादतिवादिनो
व्यावर्तयति अतएव “एष तु वा अतिवदति” इत्यत्र प्राणादिवादिनो
न प्रत्यभिज्ञा । अतोऽस्याति वादित्वनिमित्तं सत्यं पूर्वातिवादित्व-
निमित्तात् प्राणादधिकमिति विज्ञायते ।
यदि पूछो कि—यह कैसे जाना कि—प्राण शब्द से निर्दिष्ट वस्तु
से अधिक, सत्य शब्दाभिधेय वस्तु का उपदेश किया गया है ? तो सुनो—
“उस पुरुष को ऐसे देखते, मनन करते, जानते हुए, उपासक अतिवादी
( अर्थात् सत्य स्वरूप परमात्मा को बतलाने वाला ) हो जाता है” इस
प्रकार प्राणवेत्ता को अतिवादी बतलाकर “यह अतिवादी ही सत्यवादी
है” इत्यादि में अतिवादी को सत्यवादी बतलाया गया है। वाक्यगत
तु शब्द, पूर्वोक्त अतिवादी शब्द की पुनरावृत्ति का बोधक है। इसीलिए
“एष तु वा अतिवदति” इत्यादि मे, प्राणातिवादी शब्द की, अन्यथा
अर्थ प्रतीति, नहीं होती। इसी विश्लेषण से ज्ञात होता है कि—पूर्व
अतिवादि निमित्तक “प्राण” से, पर अतिवादि निमित्तक “सत्य” वस्तु
अधिक है।
ननु च प्राणवेदिन एव सत्यवदनमंगत्वेनोपदिष्टम्, अतः प्राण
प्रकरणाविच्छेद इत्युक्तम् । नैतद्युक्तम्-तु शब्देन ह्यतिवाद्येवान्यः
प्रतीयते, न तु तस्यैवातिवादिनः सत्यवदनांगविशिष्टतामात्रम् ।
“एष तु वा अग्निहोत्री यः सत्यं वदति” इत्यादिश्वग्निहोत्र्यंतरा
प्रतीतेः प्रतीतस्यैवाग्नि होत्रिणः सत्यवदनांगविधानमिति क्लिष्टा
गतिराश्रीयते अत्रत्वतिवाद्यन्तरत्वनिमित्तं सत्य शब्दाभिधेयं परं
ब्रह्म प्रतीयते ।
सत्यवादी, प्राणवेदी का ही अङ्ग है, इसीलिए प्राण प्रकरण के साथ
इसका वर्णन किया गया है, यह कथन युक्तियुक्त नहीं है। सूत्रस्थ “तु”
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