श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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स्थित्यदनाभ्याञ्च ।१।३।६।।
“द्वा सुपर्णा सप्रजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते, तयोर-
न्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति” इत्येकस्य कर्म-
फलादनम्, अन्यस्य च कर्मफलमनश्नत एव दीप्यमानतया शरीरान्त-
स्थितिमात्रं प्रतिपाद्यते । तत्र कर्मफलम् अनश्नन् दीप्यमान एव
सर्वज्ञोऽमृतसेतुः सर्वात्मा द्युम्वाद्यायतनं भवितुमर्हति, न पुनः कर्म-
फलमदन् शोचन् प्रत्यगात्मा, अतोद्यु॒भ्वाद्यायतनं परमात्मेति
सिद्धम् ।
“सदा साथ रहने वाले, परस्पर सख्य भाव रखने वाले, दो पक्षी,
एक ही वृक्ष पर रहते है, उन दोनों मे एक वृक्ष के फलों को स्वाद से
खाता है, दूसरा-उनका उपभोग न करके, केवल देखता मात्र है।”
इत्यादि में एक का कर्मफल भक्षण और दूसरे का भक्षण न करके, एक-
मात्र प्रकाशरूप से, स्थित होना बतलाया गया है । इसमें कर्मफल न
भोगने वाला प्रकाश स्वरूप ही सर्वज्ञ, अमृत सेतु, सर्वात्मा द्यु पृथ्वी आदि
का आयतन हो सकता है; कर्मफल को भोगने वाला दुःखी जीवात्मा उक्त
गुणों वाला नहीं हो सकता । इससे सिद्ध होता है कि--द्युपृथ्वी आदि
का आयतन परमात्मा ही है ।
२ भूमाधिकरणः—
भूमा सम्प्रसादादध्युपशात् ।१।३।७।।
इदमामनन्ति छन्दोगाः “यत्रनान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति
नान्यद्विजानाति स भूमा, अथ यत्रान्यत्पश्यति अन्यच्छृणोति अन्य-
द्विजानाति तदल्पम्” इति । अत्रायंभूमशब्दो भावप्रत्यान्तो व्युत्पा-
द्यते । तथा हि पृथिव्यादिषु बहु शब्दः पठ्यते, ततः “पृथ्वादिभ्य
इमनिज्वा” इति इमनिज प्रत्यये कृते “बहोर्लोपोभू च बहोः” इति
प्रकृति प्रत्ययोर्विकारे भूमेति भवति । भूमा बहुत्वमित्यर्थः । अत्र
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