श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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परब्रह्म का पुरुष रूप से वर्णन उपासना के लिए किया गया है,
ऐसा बादरि आचार्य का मत है। "जो सर्वतो भाव से अपरिमित इस
वैश्वानर आत्मा की पुरुषाकार रूप से उपासना करता है, वह व्यक्ति
समस्त लोकों में समस्त भूतों में, समस्त आत्माओं में वर्त्तमान जो भोग्य
अन्न है, उनको भोगता है" इत्यादि में उपासना को ही ब्रह्म प्राप्ति का
उपाय बतलाया गया है। "एतमेवम्" का तात्पर्य है ऐसे पुरुषाकार।
सब लोक समस्त भूत और समस्त आत्माओ के वर्त्तमान अन्न के भोग
का तात्पर्य है कि-सर्वत्र अवस्थित निरतिशय असीम आनंद स्वरूप ब्रह्म
की अनुभूति करता है। यदि अर्थ करें कि-कर्माधीन आत्माओं से मुक्त
साधारण भोगों को भोगता है, तो समीचीन न होगा; मुमुक्षुओं के लिए
ये भोग त्याज्य हैं।
यदि परमात्मा वैश्वानरः, कथंतर्हि उरः प्रभृतीनां वेद्यादित्वो-
पदेशः ? यावताजाठराग्नि परिग्रह एवैतदुपपद्यत ? इत्यत्राह-
यदि परमात्मा ही वैश्वानर है, तो उर इत्यादि का वेदी इत्यादि
के रूप में उपदेश क्यों किया गया है ? वेदी इत्यादि के वर्णन से तो यही
ज्ञात होता है कि-जाठराग्नि का ही वर्णन है इस संशय का उत्तर देते हैं-
सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥१।२।३२॥
अस्य परमात्मन एव वैश्वानरस्य द्युप्रभृतिपृथिव्यंत शरीरस्य
समाराधनभूतायाः उपासकैरहरहः क्रियमाणायाः प्राणाहुतेरग्नि
होत्रत्वसंपादनायायमुरः प्रभृतीनां वेदित्वाद्युपदेश, इति जैमिनिरा-
चार्यो मन्यते ।
द्युलोक से पृथ्वी पर्यन्त जिसका शरीर है, उस वैश्वानर परमात्मा
की ही, उपासक, नित्य प्राणाहुति रूप से, उपासना करते हैं। उसी
प्राणाहुति अग्निहोत्र को साधारण रूप से बतलाने के लिए उर आदि को
बेदी आदि रूप से वर्णन किया गया है, ऐसा जैमिनि आचार्य का मत है।
तथाहि-परमात्मोपासनोचितमेव फलं प्राणाहुत्या अग्निहोत्र-
सम्पत्ति च दर्शयतीयं श्रुतिः । "स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति,
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