श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति बतलाई गई है, वाक्य में प्रयुक्त "विश्वम्" पद, समस्त अचेतन
मात्र की उत्पत्ति का बोधक है । "ब्रह्म तपस्या द्वारा ही सृष्टि करते हैं,
उनसे अन्न की सृष्टि होती है, अन्न से प्राण, मन, सत्य, समस्त लोक,
कर्मफल और अमृत ( स्वर्ग ) आदि उत्पन्न हुए" ऐसा ब्रह्म का विश्वो-
त्पत्ति का प्रकार बतलाया गया है । तपसा का अर्थ है ज्ञान से, "जिसकी
ज्ञानमयता ही तप है" इस वाक्य से उक्त अर्थ की पुष्टि होती है । चीयते
का तात्पर्य है उपचीयते अर्थात् "बहुस्यां" ऐसे संकल्प रूप ज्ञान से ब्रह्म
सृष्टि के उन्मुख होता है । जिसे खाया जाय उसे अन्न कहते हैं; अतः
अन्नमभिजायते का तात्पर्य हुआ कि-भोक्ता विश्व का भोग्यभूत अन्न,
अतिसूक्ष्म अव्याकृत परब्रह्म से उत्पन्न हुआ प्राण, मन, स्वर्ग और मोक्ष
रूप फल के साधनीभूत कर्म आदि सभी विकार उन्हीं से उत्पन्न
होते हैं ।
"यः सर्वज्ञः सर्ववित्" इत्यादिना सृष्ट्युपकरणभूतं सार्वज्ञ-
सत्यसंकल्पत्वादिकमुक्तम् । सर्वज्ञात् संकल्पात् परस्माद्ब्रह्मणोऽक्षरा-
देतत् कार्याकारं ब्रह्म नामरूपविभक्तं भोक्तृभोग्यरूपं च जायते ।
"तदेतत्सत्यमिति" इति परस्यब्रह्मणो निरुपाधिकसत्यत्वमुच्यते ।"
मंत्रेषुकर्माणिक वयो मान्येपश्यंस्तानित्रे तायां बहुधा संततानि,
तान्याचरत नियतं सत्यकामाः "इति सार्वज्ञसत्य संकल्पत्वादि
कल्याण गुणाकारमक्षरं पुरुषं स्वतः सत्यं कामयमानाः तत्प्राप्त्यर्थं
फलान्तरेभ्यो विरक्त ऋग्यजुसामाथर्व सुकविभिदृष्टानि वर्णाश्रमो-
चितानि त्रेताग्निषु बहुधा सन्ततानि कर्माण्याचरतेति ।" एष वः
पन्थाः "इत्यारभ्य" एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः" इत्यन्तेन
कर्मानुष्ठान प्रकारं, श्रुतिस्मृति चोदितेषु कर्मसु एकतरकर्मवैधुर्येऽ-
पीतरेषामनुष्ठितानामपि निष्फलत्वम् श्रद्धयानुष्ठितस्य चाननुष्ठित
समत्वम् अभिधाय "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं
येषुकर्म, एतच्छ्रेयो येऽभिनंदंति मूढाजरामृत्यू ते पुनरेवापि यन्ति ।"
इत्यादिना फलाभिसंधि पूर्वकत्वेन ज्ञानविधुरतया चावरं कर्माचरतां
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