श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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रूपाणि तत्करोति जनेश्वर, देवतिर्यङ्मनुष्याख्या चेष्टाय॑ते
स्वलीलया । जगतामुपकाराय न सा कर्म निमित्तजा ।” इति महा-
भारते चावताररूपस्याप्यप्राकृतत्वमुच्यते—“न भूत संघसंस्थानो
देहोऽस्य परमात्मनः” इति । अतः परस्यैव ब्रह्मण एवं रूपवत्वा-
दयमपि तस्यैव धर्मः अत आदित्यमण्डलक्ष्यधिकरण आदित्यादि
जीव व्यतिरिक्तः परमात्मैव ।
भगवान् पाराशर भी कहते हैं--“ये समस्त शक्तियाँ जहाँ प्रतिष्ठित
हैं, वही परमात्मा का विश्वरूप है जो कि महान् और विलक्षण है । वह
अपनी लीला से देवता पशु मनुष्य आदि चेष्टा वाले अपने शक्तिमय रूपों
को प्रकट करते हैं । यह सब जगत के उपकार के लिए करते हैं, कर्मफल
के भोग के लिए नहीं करते ।” महाभारत में भी प्रभु का अप्राकृत
अवतार बतलाया गया है-“परमात्मा का यह देह पांचभौतिक नहीं है ।”
इन सब प्रमाणों से सिद्ध होता है कि-परमात्मा ही उक्त विशेषताओं
वाले हैं उन्हीं के ये स्वाभाविक धर्म है । सूर्य और नेत्रों में वे ही विराज-
मान हैं वे जीवों से सर्वथा विलक्षण हैं ।
भेदव्यपदेशाच्चान्यः १।१।२२
आदित्यादिजीवेभ्यो भेदोव्यपदिश्यतेऽस्य परमात्मनः “य
आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यश्शरीरं
य आदित्यमन्तरो यमयति”—य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो
यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमंतरो यमयति”—
योऽक्षरमन्तरे संचरन्यस्याक्षरं शरीरं यमक्षरं न वेद, योमृत्युमंतरे-
संचरन् यस्य मृत्युः शरीरं यं मृत्युर्नवेद एष सर्वभूदन्तरात्माऽपहत-
पाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” इति चास्यापहतपाप्मनः पर-
मात्मनस्सर्वान्जीवान् शरीरत्वेन व्यपदिश्य तेषामन्तरात्मत्वेनैनं
व्यपदिशति । अतस्सर्वेभ्योहिरण्यगर्भादिजीवेभ्योऽन्य एव परमा-
त्मेतिसिद्धम् ।
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