श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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दस्ति । एवं च सति “अस्थूलमनण्वह्रस्वम्” इत्यादयो जीवात्मन्-
स्वाभिप्राया भवंति मोक्षशास्त्राण्यपि तत्स्वरूपतत्प्राप्त्युपायोपदेश-
पराणि-इति '
विशेष पुण्यवान जीव ही उक्त पुरुष हो सकता है क्यों उसके
शरीर का वर्णन किया गया है, शरीर संबंध तो जीवो का ही हो सकता
है । शुभाशुभ कर्म और गुण के संयोग से ही शरीर संबंध होता है । तभी
कर्म संबंध रहित शरीर हीन मोक्ष की प्राप्ति कही गई है—
“शरीराभिमान के रहते पाप पुण्य नष्ट नहीं होते, शरीराभिमान शून्य
हो जाने पर पाप पुण्य स्पर्श नहीं कर सकते ।” इत्यादि ।
पुण्य की अधिकता से अधिक ज्ञान और अधिक शक्ति संपन्न होना
भी संभव है, लोकेश कामेश इत्यादि उपाधियां भी जीवात्मा के लिए ही
प्रयुक्त होती हैं । उपास्यता, फलदातृता, पापप्रक्षालनता और मोक्षदातृता
आदि क्षमतायें भी उसमें हो सकती हैं । मनुष्यों में ही प्रायः अधिक
पुण्यवान और ज्ञान शक्ति संपन्न महापुरुष देखे जाते हैं, सिद्ध, गंधर्व,
देव तथा देवाधिदेव इन्द्र उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं ।
मनुष्य से ब्रह्मा पर्यन्त में से कोई विशेष पुण्यवान महापुरुष एक-
एक कल्प तक ऐश्वर्य संपन्न होकर जगत् सृष्टि आदि का संपादन करते
हैं । जगत्कारणता और जगदन्तरात्मकता के बोधक वाक्य भी ऐसे ही
सर्वज्ञ सर्वशक्ति संपन्न महापुरुष के लिए घटित होते हैं । इसलिए
जीवात्मा से अतिरिक्त परमात्मा नामक कोई विशेष नहीं है । “अस्थूल,
अनणु-अह्रस्व’ इत्यादि विशेषण भी जीवात्मा बोधक ही सिद्ध होते हैं
तथा मोक्षोपदेशक शास्त्र वाक्य भी जीव स्वरूप निर्देशक एवं प्राप्ति
उपाय के रूप में ही घटित होते हैं, ऐसा मानना होगा ।
सिद्धान्त—एवं प्राप्तेऽभिधीयते—अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्—अंतरादित्ये
ऽन्तरक्षिणि च यः पुरुषः प्रतीयते, स जीवादन्यः परमात्मैव, कुतः ?
तद्धर्मोपदेशात् जीवेष्वसंभवस्तदतिरिक्तस्यैव परमात्मनो धर्मोऽ-
यमपहतपाप्मत्वादिः “स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः” इत्यादिना-
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