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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 696 में से

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पृष्ठ 412

( ३५२ )
प्रधानादि शब्दाभिधेयाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा, तथैव हि चतुर्मुखादीनां
कारणत्वं, इह च “सोऽकामयत, बहुस्यां प्रजायेय” इत्यचित्'संगं
रहितस्य स्वकामादेव विचित्रचिदचिद्वस्तुनः सृष्टिः “इदं सर्वम-
सृजत यदिदं किं च” इत्याम्नायते । अतोऽस्यानंदमयस्य जगत्
सृजतो नानुमानिकाचिद्वस्तुसंसर्गापेक्षा प्रतीयते । ततश्च जीवा-
दन्य आनन्दमयः ।
प्रधान आदि शब्द वाच्य आनुमानिक जड प्रकृति की अपेक्षा तो
अविद्याऽधीन जीवात्मा को ही जगत् का कारण मानना पड़ेगा, इसीलिए
जीव विशेष ब्रह्मा आदि को जगत् कर्त्ता माना भी गया । किंतु इस प्रसंग
में ‘सोऽकामयत’ वाक्य से जड़संसर्ग रहित केवल ब्रह्म से ही जड़
चेतनात्मक समस्त सृष्टि ‘इदं सब’ इत्यादि से बतलाई गई है । प्रसंग
से तो आनंदमय की जगत्सर्जन्ता, आनुमानिक जड प्रधान ( प्रकृति )
संसर्गसापेक्ष ज्ञात नहीं होती । इससे भी जीव से भिन्न आनंदमय सिद्ध
होता है ।
इतश्च—इससे भी भिन्नता सिद्ध होती है कि--
अस्मिन्नस्य च तद्योगंशास्ति ।१।१।२०।।
अस्मिन्-आनन्दमये, अस्य-जीवस्य, तद्योगम्-आनन्द योगम्,
शास्ति-शास्त्रम्—“रसोवैसः रसं ह्येवायंलब्ध्वानन्दी भवति” इति ।
रसशब्दाभिधेयानन्दमयलाभादयं जीवशब्दाभिलपनीय आनन्दी
भवतीत्युच्यमाने यल्लाभादानन्दी भवति स एव इत्यनुन्मत्तः को
ब्रवीतीत्यर्थः ।
“वह रस स्वरूप है—यह जीव उस रस का आस्वादन करके
आनंदित होता है” इत्यादि प्रसिद्ध मंत्र इस जीव का, आनंदमय से
आनंद संबंध बतलाता है । इस वाक्य में “रस” का अर्थ आनंदमय तथा
“अयं” का अर्थ जीव है । यह जीव, आनंदमय रस को प्राप्त कर
आनंदित होता है, ऐसा स्पष्ट उल्लेख होने पर भी, जिसकी प्राप्ति से जो