श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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और फिर जो यह कहा कि—समीपवर्त्ती "एकहायनी" पद के
साथ "क्रय ' का संबंध हो सकता है "अरुणिम" पद के साथ नहीं हो
सकता, सो यह भी असंगत बात है, क्योंकि—यह नियम है कि—गुण-
वाची पद के साथ यदि द्रव्यवाची पद का सामानाधिकरण्य होता है और
उस द्रव्य का किसी अन्य विरुद्ध गुण का संबंध नहीं होता तो सामाना-
धिकरण विशिष्ट गुणवाची पद की आश्रित जो गुण बोधकता है, उसका
क्रियापद से निर्विरोध समन्वय हो जाता है । उपर्युक्त नियमानुसार
सिद्धान्त "अरुणिमा" शब्द का अन्वय सिद्ध हो जाने पर भी, द्रव्य
और गुण दोनों का क्रय साधनता में समन्वय न मानें, अर्थात् परस्पर
समन्वय की बात सिद्ध हो जाने पर भी, यह असंभावना बनी रहे, यह भी
असंगत बात है [ निर्णयपूर्वक सिद्ध हो जाने पर भी यह कहते रहें कि—
द्रव्य और गुण का क्रय साधन में समन्वय नहीं हो सकता, यह हठवाद
मात्र है ] उपर्युक्त बात ही यथार्थ है ।
तस्मात् तत्त्वमस्यादि सामानाधिकरण्ये पदद्वयाभिहित
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