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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 696 में से

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पृष्ठ 388

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“दण्डित्व, कुण्डलित्व” की तरह रूपत्व, रसत्व और गंधवत्व आदि होते
हुए भी एकता के विरुद्ध नही है । इस प्रकार केवल विरोध का अभाव
ही नही है, अपितु प्रवृत्ति निवृत्ति के भेदानुसार जो सामानाधिकरण्य का
नियम है, उसके अनुसार भी दो धर्मों वाली विशेषताओं का उपपादन
हो जाता है । केवल वस्तु स्वरूप की एकता के बतलाने, या अनेक पदों
के प्रयुक्त होने पर भी उपयुक्त कारण न होने से सामानाधिकरण्य का
नियम लागू नहीं हो सकता । विशेष्य के साथ विशेषणों का संबंध
स्वीकार न करके, केवल वस्तुमात्र बोधकता ही स्वीकारी जाय, तब भी,
एक विशेषण से ही जब वस्तु की विशेषता उपलक्षित हो जाती है, तब
अन्यान्य विशेषण स्वतः ही व्यर्थ हो जाते हैं । अन्यान्य विशेषणों द्वारा
यदि उपलक्ष्य वस्तु का, आकार भेद ही माना जावे, तब भी उन विशे-
षणों से वस्तु की सविशेषता सिद्ध हो जाती है ।
“सोऽयं देवदत्तः” इत्यत्रापि लक्षणा गन्धो न विद्यते, विरोधा-
भावात् । देशान्तरसंबंधतयाऽतीतस्य सन्निहितदेशसंबंधतया
वर्त्तमानत्वाविरोधात् । अतएव हि “सोऽयम्” इति प्रत्यभिज्ञा
कालद्वयसंबंधिनोवस्तुन ऐक्यमुपपाद्यते वस्तुनः स्थिरत्ववादिभिः ।
अन्यथा प्रतीतिविरोघे सति सर्वेषां क्षणिकत्वमेव स्यात् । देश-
द्वयसंबंधविरोधस्तु कालभेदेन परिह्रियते ।
“यह वही देवदत्त है” इस उदाहरण में भी किसी प्रकार की
लक्षणा की संभावना नही है । क्योंकि—लक्षणा का कारणीभूत किसी भी
प्रकार का विरोध नहीं है । अतीत और स्थानान्तर में दृष्ट व्यक्ति के
वर्त्तमान में देखे जाने पर उस व्यक्ति में कोई अन्तर तो आ नहीं जाता;
‘यह वही है’ ऐसा जो स्मृति परक ज्ञान है, वह काल द्वय ( भूत और
वर्त्तमान ) में दृष्ट एक ही व्यक्ति के अभेद का ही द्योतक है—ऐसा
वस्तुस्थिरत्व वादियों का मत है । अन्यथा, प्रतीति के अनुसार भेद मान
लेने से तो, सारी ही वस्तुएं क्षणिक माननी पड़ेंगी दो स्थानों की जो
विभिन्नता है, वह कालभेद से निवृत्त हो जाती है ।
यतः समानाधिकरणपदानामेकविशेषणविशिष्टैकार्थवाचि-