श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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इतश्च न प्रधान
प्रधान को कारण मानना इसलिए भी कठिन है कि-
श्रुतत्वाच्च १।१।१२॥
श्रुतमेव हि अस्यामुपनिषदि अस्य सच्छब्दवाच्यस्य आत्मत्वेन,
नामरूपयोर्व्याकर्त्तृत्वं,सर्वज्ञत्वं,सर्वशक्तित्वं,सर्वाधारत्वं अपहतपाप्म-
त्वादिकं, सत्यकामत्वं, सत्यसंकल्पत्वं च-“अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य
नामरूपे व्याकरवाणि”-सन्मूलाःसौम्येमाःसर्वाःप्रजाःसदायतनाःसत्प्र-
तिष्ठाः-“ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा”यच्चास्येहास्ति-
यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितम् तस्मिन् कामान्त्समाहिताः-
“एष आत्मा अपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपासः
सत्यकामः सत्यसंकल्पः” इति ।
इस उपनिषद् में,इस सत् शब्द वाच्य की,आत्मारूप से नाम और
रूप की व्याकृति, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिसंपन्नता, सर्वाधारकता, निर्दोषता,
निष्पापता, सत्यकामता सत्यसंकल्पता आदि स्पष्टतः बतलाई गई है-जैसे-
“इसमें जीवात्मारूप से प्रविष्ट होकर नामरूप का विस्तार करूँगा”-
“सत् ही इस प्रजा का मूल आश्रय और प्रतिष्ठा है”-“सारी वस्तुएं
सदात्मक ही है,वही सत्य और आत्मा है”-“इस जगत में जो कुछ भी
विद्यमान है,या जो कुछ नहीं( अतीत)है,वह सब परमात्मा में ही समाहित
(लीन)है,संपूर्ण कामनायें और अभिलाषायें भी उन्हीं में प्रविष्ट हैं”-
“यह आत्मा निष्पाप,जरा मृत्यु शोक तथा भूख प्यास रहित,सत्य काम
और सत्यसंकल्प है”
तथा च श्रुत्यंतराणि-“ न तस्यकश्चित् पतिरस्य लोके न
चेशिता नैव च तस्य लिंगम्, स कारणंकरणाधिपाधिपो न चास्य
कश्चित् जनिता न चाधिपः”-“सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो
नामानिकृत्वाऽभिवदन्यदास्ते”-“अन्तःप्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वा