श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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ब्रह्म ही सत् शब्द का स्वाभाविक वाच्यार्थ हैं, जैसा कि--‘‘हे
सोम्य ! मेरे निकट स्वप्नांत ( सुषुप्ति कालीन जीव की अवस्था ) को
जानो, जिस समय वह पुरुष ( जीव ) सोता है, तब सत् संपन्न (ब्रह्मलीन)
हो जाता है, स्वस्वरूप को प्राप्त हो जाता है, इसीलिए उसे ‘‘स्वपिति’’
कहते हैं, उस समय वह स्वरूप में अपीत ( लीन ) हो जाता है’’ इस
वाक्य में सुषुप्त जीव को सत् से संपन्न अर्थात् ‘‘स्वमपीत अपने में
प्रलीन’’ कहा गया है। प्रलय का अर्थ होता है अपने कारण में लीन
होना। इससे स्पष्ट होता है कि--अचेतन प्रधान, चेतन जीव का कारण
नहीं है। ‘‘स्वंम पीतो भवति’’ कहने का तात्पर्य है कि--जीव स्वीय
(परमात्मा) को प्राप्त होता है।
चिन्मय वस्तु अर्थात् चेतन ही जिसका शरीर है और जो जीवात्मा
में, अन्तर्गत व्याप्त है, उसे ही उक्त प्रसंग में जीव शब्द से बतलाया गया
है ( अर्थात् जो जीव का भी जीव है ) ‘‘मैं इसमें प्रवेश कर जीवात्मा के
रूप से, वस्तुओं के नाम रूप को अभिव्यक्ति करूँगा’’ ऐसे नाम रूप के
व्यक्तीकरण के उपदेश से भी उक्त तथ्य की पुष्टि होती है।
प्रलयकाल की तरह, सुषुप्ति काल में भी, नाम और रूप का
संबंध नहीं रहता, इसलिए जीव शब्द से उल्लेख्य वह ब्रह्म ही, सुषुप्ति
काल में ‘‘सत्’’ शब्द से कहा गया है। जैसा कि--‘‘हे सोम्य। उस समय
जीव सत् संपन्न होता है, स्वरूप प्राप्त करता है।’’
इसी प्रकार के अन्य प्रकरण में भी नाम रूप का संबंध न दिखला-
कर, प्राज्ञ ( परमात्मा ) से ही संबंध दिखलाया गया है। जैसे कि--
‘‘जीव प्राज्ञ आत्मा के साथ सम्मिलित होकर वाह्य और आभ्यन्तर
किसी भी विषय को नहीं जानता (आत्म विभोर हो जाता है)’’
मोक्ष न होने तक केवल नाम रूप के साथ संबंध होने से
जीवात्मा को स्व ( परमात्मा ) से भिन्न विषयक ज्ञान ( इस जगत में )
हुआ करता है। जो जीव सुषुप्ति काल में नाम रूप को छोड़कर
सत् ( ब्रह्म ) से संसक्त हो जाता है, वही जाग्रत अवस्था में नामरूप
से संसक्त होकर पुनः पूर्व रूप में हो जाता है, ऐसा अन्य श्रुति में
स्पष्ट उल्लेख है--‘जिस समय यह स्वप्न रहित सुषुप्तावस्था में रहता
है उस समय प्राण ( परमात्मा ) से एकाकार हो जाता है। जागने पर
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