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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 696 में से

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पृष्ठ 350

हैं। प्रवृत्ति निवृत्ति बोधक वाक्य, पुरुष के परिमित अभीष्ट प्रतिपादक
होते हुए भी, वास्तविक प्रयोजन (आत्यंतिक दुःख निवृत्ति रूपी मुक्ति)
के साधन में समर्थ नहीं हैं।
एवंभूतं ब्रह्म कथं प्राप्यत इत्यपेक्षायां “ब्रह्मविदाप्नोतिपरम्”
आत्मानमेवलोकमुपासीत “इति वेदनादिशब्दैरुपासनं ब्रह्मप्राप्त्युपाय-
तया विधीयते। यथा “स्ववेश्मनि निधिरस्ति” इति वाक्येन निधि-
सद्भावं ज्ञात्वा तृप्तःसन् पश्चादुपादाने च प्रवर्त्तते। यथा च—
कश्चिद्राजकुमारो बालक्रीडासक्तो नरेन्द्रभवनान्निष्क्रान्तो मार्गाद्-
भ्रष्टो नष्ट इति राज्ञा विज्ञातः स्वयं चाज्ञातपितृकः केनचिद्द्विज-
वर्येण वर्धितोऽधिगतवेदशास्त्रः षोडशवर्षः सर्वकल्याणगुणाकरः
तिष्ठन् “पिता ते सर्वलोकाधिपतिः गाम्भीर्यौदार्यवात्सल्यशौशौल्य
वीर्यपराक्रमादिगुणसंपन्नः त्वामेवनष्टं पुत्रं दिदृक्षुः पुरवरेतिष्ठति”
इति केनचिदभियुक्ततमेन प्रयुक्तं वाक्यं शृणोति चेत्, तदानीमेव—
“अहं तावत् जीवतः पुत्रः मत्पिता च सर्वं संपत्समृद्धः” इति निरति-
शयहर्षसमन्वितो भवति। राजा च स्वपुत्रं जीवन्तमरोगमति
मनोहरदर्शनं विदितसकलवेद्यश्रुत्वाऽवाप्तसमस्तपुरुषार्थो भवति।
पश्चात्तदुपादाने च प्रवर्त्तते। पश्चात्तावुभौ संगच्छेते च इति।
ऐसा अद्भूत ब्रह्म कैसे प्राप्त हो सकता है? ऐसी आकांक्षा होने पर—
“ब्रह्मवेत्ता परंतत्त्व को प्राप्त करता है “आत्मा की ही दृष्टव्य रूप से
उपासना करनी चाहिए” इत्यादि वाक्य में “वेदन” आदि शब्द बोध्य
उपासना ही, प्राप्तव्य ब्रह्म के उपाय रूप से विहित है।
जैसे कि—कोई व्यक्ति—‘अपने घर में धनगड़ा है” इस बात को
जानकर प्रसन्नता से उसे निकालने के लिए प्रयत्नशील होता है। तथा
जैसे—कोई राजकुमार बालकों के साथ खेलता हुआ राजमहल से निकल
कर खो जाता है, राजा उसे जानता है, पर वह अबोध होने के कारण
पिता को नहीं जानता, वह कदाचित् किसी श्रेष्ठ विद्वान ब्राह्मण द्वारा
पोषित और वेदशास्त्र का पारंगत होकर जब वयस्क होता है, तब किसी