श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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रहित ) ब्रह्म की चर्चा ही समाप्त हो जायगी । तथा सभी शरीरों में एक
ही जीव का साम्राज्य होगा ( जीव की भिन्नता भी समाप्त
हो जायगी )
चौथी कल्पना में जब जीव को ब्रह्म से भिन्न माना गया है तब,
जीव के भेद की औपाधिकता समाप्त हो जाती है ( अर्थात् उपाधि
संबंध से संभाव्य भेद की चर्चा समाप्त हो जाती है )
अंतिम पांचवी कल्पना तो चार्वाक मत में ही हो सकती है ।
इसलिए अभेद शास्त्र की बलवत्ता से, सारे भेदों की अविद्यामूलकता ही
स्वीकारनी होगी । प्रवृत्ति या निवृत्ति रूप प्रयोजन के प्रकाशक वेदांत
वाक्यों की प्रामाणिकता, ब्रह्म के स्वरूपावबोध में, ध्यानविधिपरक
होने से ही चरितार्थ होती है ।
तदप्ययुक्तम्—ध्यानविधिशेषत्वेऽपि वेदांतवाक्यानामर्थसत्यत्वे
प्रामाण्यायोगात् । एतदुक्तं भवति-ब्रह्मस्वरूपगोचराणिवाक्यानि
किं-ध्यानविधिनैकवाक्यतामापन्नानि ब्रह्मस्वरूपे प्रामाण्यं प्रत्य-
पद्यन्ते, उत् स्वतंत्राण्येव ? एकवाक्यत्वे ध्यानविधिपरत्वेन ब्रह्म-
स्वरूपे तात्पर्यं न संभवति । भिन्नवाक्यत्वे प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजन-
विरहादनबोधकत्वमेव । न च वाच्यम्- ध्यान नाम स्मृतिसंतति-
रूपम् । तच्च स्मर्त्तव्यैकनिरूपणमिति ध्यानविधेः स्मर्त्तव्यविशेषा-
कांक्षायाम् “इदं सर्वं यदयमात्मा” ब्रह्म सर्वानुभूः” सत्यंज्ञानमनंतं-
ब्रह्म” इत्यादीनि स्वरूप तद्विशेषादीनि समर्पयंन्ति । तेनैकवाक्या-
तामापन्नान्यर्थ सद्भावेप्रमाणमिति । ध्यानविधेः स्मर्त्तव्यविशेषापेक्ष-
त्वेऽपि “नामब्रह्म” इत्यादि दृष्टिविधिवदसत्येनाप्यर्थविशेषेण ध्यान-
निर्वृत्युपपत्तेः ध्येय सत्यत्वानपेक्षणात् । अतोवेदांतवाक्यानां प्रवृत्ति-
निवृत्ति प्रयोजन विधुरत्वात् ध्यानविधिशेषत्वेऽपि ध्येयविशेषस्वरूप
समर्पणमात्रपर्यवसानात् स्वातंत्र्येऽपि बालातुराद्युपच्छन्दनवाक्यवत्
ज्ञानमात्रेणैव पुरुषार्थपर्यन्तता सिद्धेश्च परिनिष्पन्नवस्तुसत्यता
गोचरत्वाभावात् ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वं न संभवतीति प्राप्तम् ।
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