श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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कार्यरूप और व्यक्तिरूप से भेद मानने से विरोध नहीं होगा, यह बात भी
विचारपूर्ण नहीं प्रतीत होती। मैं पूछता हूँ कि—आकार भेद से अविरोध
बतलाने का, क्या एक आकार में अभेद तथा अन्य आकार में भेद ही
तात्पर्य है ? अथवा दोनों प्रकार के आकारों में भेदाभेद तात्पर्य है ?
पहिली बात—“व्यक्तिगत भेद और जातिगत अभेद में - एक ही वस्तु
की द्वयात्मकता नहीं है ( जाति और व्यक्ति एक पदार्थ नहीं हैं) यदि
जाति और व्यक्ति को एक ही वस्तु मानते हो तो” आकारभेद से अविरोध
वाली बात का आग्रह छोड़ना होगा, क्योंकि एक ही पदार्थ में वैलक्षण्य
और अवैलक्षण्य, दोनों नितांत विरुद्धतायें हो नहीं सकतीं ऐसा पहिले
भी कह चुके हैं। दूसरी बात में—परस्पर विजातीय दो आकार,
उपलब्धि के विषय नहीं हो सकते । जाति और व्यक्ति की आश्रयभूत
तीसरी वस्तु का अस्तित्व मानने से भी, अभेद का प्रतिपादन नहीं होता,
क्योंकि—जब वे दोनों ही परस्पर विलक्षण है तो, तीमरी की विलक्षणता
भी स्वाभाविक है। दोनों आकारों से विशिष्ट तीसरी वस्तु में आकार
भेद से द्वैताद्वैत भाव मानने से संशय होता है कि—अपने से विलक्षण,
अपने आश्रय को, वे दोनों आकार, अपने विरुद्ध दोनों धर्मों में, समा-
विष्ट कैसे कर सकेंगे ? तीनों वस्तुओं को अविलक्षण मानकर भी, ऐसा
कैसे संभव हो सकेगा ? दोनों आकार और उसके आकार की विलक्षणता
मानने के लिए, किसी चौथी वस्तु के अस्तित्व की कल्पना करनी पड़ेगी
जिससे अनवस्था होगी।
न च संप्रतिपन्नैकव्यक्तिप्रतीतिवत् ससामान्येऽपि वस्तुन्येक-
रूपा प्रतीतिरूपजायते । यतः “इदमित्थं” इति सर्वत्र प्रकारप्रकारित-
यैव सर्वा प्रतीतिः । तत्र प्रकारांशो जातिप्रकारांशो व्यक्तिरिति
नैकाकारा प्रतीतिः । अतएव जीवस्यापि ब्रह्मणो भिन्नाभिन्नत्वं न
संभवति । तस्मादभेदस्यानन्यथासिद्धशास्त्रमूलत्वादनाद्यविद्या-
मूल एव भेदप्रत्ययः ।
निर्विवाद ऐक्य व्यक्ति की प्रतीति की तरह, सामान्य वस्तु में भी
एकरूपा प्रतीति, संभव नहीं हो सकती, क्योंकि—“यह वस्तु ऐसी है”
ऐसी प्रकार प्रकारी ( सामान्य-विशेष या विशेषण-विशेष्य भाव ) प्रतीति
ही, प्रायः सब जगह होती है। वहाँ प्रकार जाति, तथा प्रकारी व्यक्ति