सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 340

( २८० )
ननुच-“सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता” इति
सह श्रुत्या तदानीमपि भेदः प्रतीयते वक्ष्यति च-“जगद्व्यापारवर्ज्यं
प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च “भोगमात्र साम्यलिंगाच्च” इति
नैतदेवम्-“नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” इत्यादि श्रुतिशतैरात्मभेद
प्रतिषेधात् । “सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सहब्रह्मणा विपश्चिता”इति
सर्वैःकामैःसह ब्रह्माश्नुते-सर्वगुणान्वितं ब्रह्माश्नुत इत्युक्तं भवति ।
अन्यथाब्रह्मणा सहेत्यप्राधान्यं ब्रह्मणः प्रसज्येत् । “जगद्व्यापारवर्जं”
इत्यत्र मुक्तस्य भेदेनावस्थाने सत्यैश्वर्यस्य न्यूनता प्रसंगो वक्ष्यते,
अन्यथा “संपद्याविर्भावः स्वेनशब्दात्” इत्यादिभिर्विरोधात् ।
तस्मादभेद एव स्वाभाविकः । भेदस्तु जीवानां परस्मात् ब्रह्मणः
परस्परं च बुद्धीन्द्रियदेहोपाधिकृतः ।
(प्रश्न) ‘वह मुक्त पुरुष,सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ समस्त कामनाओं
का भोग करता है “इस श्रुति से तो मोक्ष दशा में भी भेद प्रतीति हो
रही है सूत्रकार भी- “जगद् व्यापार वर्ज०” तथा “भोगमात्र साम्य-
लिंगाच्च” में ऐसा ही कहते हैं-
(उत्तर) बात ऐसी नहीं है-“इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है”
इत्यादि सैकड़ो श्रुतियो से ब्रह्म-जीव के भेद का निषेध किया है । “सोऽ-
श्नुते” इत्यादि का तात्पर्य है कि-मुक्त पुरुष समस्त कामनाओं से
युक्तब्रह्म का भोग करता है। ऐसा अर्थ न मानने से-ब्रह्म अप्रधान तथा
भोग प्रधान हो जायगा। “जगद्व्यापारवर्जं ” सूत्र में भी, मुक्त पुरुष
को ब्रह्म से पृथक् मानने से, मुक्त के ऐश्वर्य की न्यूनता सिद्ध होगी ।
अन्यथा “सपद्याविर्भावस्वेन शब्दात्” सूत्र से विरुद्धता होगी । इससे
सिद्ध होता है कि-अभेद स्वाभाविक ही है, जीवों का, परब्रह्म से भेद,
बुद्धि-इन्द्रिय-देहादि उपाधि कृत है ।
ब्रह्म, यद्यपि निराकार व्यापक है फिर भी घट आदि भेद से
आकाश की तरह, बुद्धि आदि उपाधियों से संबंध ब्रह्म में भी, भेद संभव
है । भिन्न ब्रह्म में, बुद्धि आदि उपाधियों का संयोग संभव नहीं है तथा
[email protected]