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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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पृष्ठ 316

( २५६ )
ग्रसित व्यक्ति को जल पीना चाहिए- "स्वर्ग की कामना से यज्ञ करना
चाहिये"-'कलंज नहीं खाना चाहिए" इत्यादि प्रमाण उक्त बात की
हीं पुष्टि करते हैं ।"
जो यह कहा कि--सिद्ध वस्तु परक "तुम्हारे पुत्र हुआ" "यह
सर्प नही रस्सी है" इत्यादि वाक्यों में हर्ष और भय निवृत्ति रूप अभीष्ट
निहित है; सो यहां विचारणीय यह है कि-पुत्र जन्म आदि घटना से,
अभीष्ट है, अथवा पुत्र जन्म विषयक ज्ञान मात्र से (अभीष्ट होता है)?
विद्यमान वस्तु भी ज्ञान की विषय हुए बिना प्रयोजन साधक नहीं होती,
तद् विषयक ज्ञान ही अभीष्ट होता है उक्त मत मानने से; पदार्थ के
बिना, केवल ज्ञान से ही अभीष्ट सिद्धि होगी, पदार्थ की सत्ता तो
आवश्यक होगी नही तथा प्रयोजन पर्यवसान ही शास्त्र का उद्देश्य होगा,
वह पदार्थ का अस्तित्व सूचक तो होगा नही, पदार्थ के अस्तित्व में तो
उसे प्रामाणिक कहा नहीं जा सकता। इससे स्पष्ट है कि-सब जगह
प्रवृत्ति निवृत्ति परक और तद् विषयक ज्ञान प्रति पादक शास्त्र ही, स
प्रयोजन या सार्थक है; शुद्ध स्वतः सिद्ध वस्तु "ब्रह्म" के प्रति