श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 311, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५१ )
जगतोऽपि नित्यत्वाविरोधादीश्वरासिद्धेः । नाप्यनित्यम्, तद्व्य-
तिरिक्तस्य तच्छरीरहेतोस्तदानीमभावात् । स्वयमेव हेतुरिति चेत्,
न, अशरीरस्य योगात् । अन्येन शरीरेण सशरीर इति चेत्, न,
अनवस्थानात् ।
और भी तर्क किये जाते है कि यदि ईश्वर जगत बनाता है तो
क्या शरीर धारण करता है अथवा नहीं ? बिना शरीर वाला होकर तो
वह सृष्टि कर नहीं सकता, बिना शरीर वाले का कोई निर्माण कार्य
देखा नहीं जाता । मानस कार्य भी शरीर धारी के ही होते हैं, मन के
नित्य होते हुए भी, मुक्त पुरुषों में मानस कार्य का अभाव होता है ।
ईश्वर शरीर धारण कर, सृष्टि करता है, यह भी थोथा तर्क है । यदि
ईश्वर का शरीर है तो वह नित्य है या अनित्य ? नित्य तो हो नहीं
सकता, उसकी नित्य साकारता स्वीकारने से, साकार जगत को भी
नित्य मानना पड़ेगा और फिर नित्य जगत के उत्पादन में ईश्वर की
उपयोगिता ही क्या रहेगी ? ईश्वर का शरीर अनित्य भी नहीं हो सकता
क्योंकि-ईश्वर के शरीर के निर्माता का कोई वर्णन नहीं मिलता । वह
स्वयं तो अपने शरीर का निर्माता हो नहीं सकता, कोई भी अशरीरी,
शरीर का निर्माता नहीं हुआ करता । अपने अन्य शरीर से वह शरीर
निर्माण करता है, ऐसा मानने से अनेक अन्य निर्माता शरीरों की कल्पना
करनी पड़ेगी, अतः अनवस्था उपस्थित होगी ।
स किं सव्यापारो निर्व्यापारो वा ? अशरीरत्वादेव न
सव्यापारः । नापि निर्व्यापारः कार्यं करोति मुक्तात्मवत् । कार्यं
जगदिच्छामात्रव्यापारकर्तृकमित्युच्यमाने पक्षस्याप्रसिद्धविशेषण-
त्वम्, दृष्टान्तस्य च साध्यहीनता । श्रतो दर्शनानुगुण्येनेश्वरानु-
मानं दर्शनानुगुण्यपराहतमिति शास्त्रैकप्रमाणकः परब्रह्मभूतः
सर्वेश्वरः पुरुषोत्तमः ।
वह ईश्वर सचेष्ट है अथवा निश्चेष्ट ? ( यह भी विचारणीय है )
वह शरीरी नहीं है, इसलिए सचेष्ट नहीं कह सकते । निश्चेष्ट भी नहीं