श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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आदि गायत्री के चार रूपों का निरूपण तथा गायत्री
का ब्रह्म के रूप में उपपादन । सप्तमी एवं पंचमी
विभक्ति से निर्दिष्ट ज्योति शब्द की अग्राह्यार्थता
का निरास । —पृ० ३७१-७६
११. ऐन्द्रप्राणाधिकरण (सूत्र २८-३२)
१. ऐन्द्र प्रोक्त “प्राण” शब्द की जीवादि अर्थ में शंका
तथा परमात्मार्थ रूप से उसका समाधान ।
२ जीवार्थ रूप से पुनः शंका तथा प्राण की अध्यात्म
उपदेश के रूप से बहुल चर्चा होने से उसकी ब्रह्म
रूपता का सुदृढ़ उपपादन ।
३. शास्त्रलब्ध ज्ञान के अनुसार ऐन्द्र कृत उपदेश की
परमात्मपरता का समर्थन । प्राण शब्द की मुख्य
प्राणार्थ रूप से की गई शंका का सतर्क समाधान ।—पृ० ३७६-८५
(द्वितीय पाद)
विषय, भूमिका, प्रथम पाद से संबंध, प्रथम पाद के
विषय का संक्षिप्त विवरण, द्वितीय, तृतीय और
चतुर्थ पादों के वक्तव्य विषयों की पूर्व पीठिका। —पृ० ३८५-८६
१ प्रसिद्ध्याधिकरण (सूत्र १-८)
१. पूर्वपक्ष—श्रुत्युक्त मनोमयादि विशिष्ट पदार्थ की
जीवता तथा ब्रह्म शब्द की जीवार्थता का समर्थन ।
२. (सिद्धान्त)—मनोमयादि शब्द और ब्रह्म शब्द की
परब्रह्मार्थता का निरूपण । मनोमयादि वाक्योक्त
गुणराशि का ब्रह्म संबंधी उपपादन । जीव कर्तृं ता
और कर्मता का विरोध, ब्रह्म संबंधी अनुकूल शब्द
विशेष तथा स्मृति प्रमाणों का प्रदर्शन । हृदय में
ब्रह्म की स्थिति का प्रतिपादन तथा हृदयस्थ ब्रह्म
की संभाव्य भोग प्रसक्ति का प्रत्याख्यान । —पृ० ३८६-४०५
२. अत्ताधिकरण (सूत्र ९-१२)
१. ब्राह्मण आदि समस्त की जीवता का समर्थन, सर्व-
भोक्ता हेतुक उनकी ब्रह्मता का प्रतिपादन ।
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