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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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५. बद्ध, मुक्त आदि अवस्थाओं वाले जीव की आनन्द-
मयता से अनुपपत्ति तथा आनन्दमय से उसका भेद
दिग्दर्शन । सृष्टि विषयक संकल्प वाले सृष्टा का
आनन्दमय के रूप में समर्थन और उसी हेतु से
जीवात्मा की पृथकता का प्रतिपादन । आनन्दमय
ब्रह्म की प्राप्ति से जीव के आनन्दी होने के आधार
पर जीव की भिन्नता का उपपादन । —पृ ३०६-५४
७ अन्तराधिकर‍ण (सूत्र २१-२२)
१. पूर्वपक्ष--आदित्य मण्डलस्थ और नेत्रस्थ पुरुष की
जीवभाव और देवभाव आदि रूपों में संभावना ।
२. (सिद्धान्त)--आदित्य और नेत्रमध्यवर्ती पुरुष की
परब्रह्मता की उपस्थापना । परब्रह्म की सगुणता
तथा भक्तानुग्रह से विचित्र जगदाकार के रूप में
आविर्भावता का वर्णन । भेदोक्ति के आधार पर
अक्षि और आदित्यपुरुष की जीव से पृथकता का
विवेचन । —पृ०३५४-६३
८ आकाशाधिकरण (सूत्र २३)
१. पूर्वपक्ष--आकाश शब्द की भूताकाश रूपक शंका ।
२. (सिद्धान्त) आकाश शब्द की परब्रह्मता का
प्रतिपादन । —पृ०३६३-७०
९ प्राणाधिकरण (सूत्र २४)
आकाश के दृष्टान्त से प्राण शब्द की परमार्थता का
निरूपण । —पृ०३७०-७१
१० ज्योतिरधिकरण (सूत्र २५-२८)
१. ज्योति शब्द की आदित्य आदि अर्थों में शंका ।
२. (सिद्धान्त) ज्योति शब्द की परब्रह्मता का उपपादन ।
गायत्री छन्दोल्लेख्य ज्योति शब्द की अब्रह्मता की
शंका का निरास । भूत, पृथिवी, शरीर और हृदय
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