सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 221

( १६१ )
र्था ता, उसे मोक्ष का काय माना जायगा, अतएव वह अनित्य है यह
भी निश्चित है ।
अस्याज्ञानस्याश्रयनिरूपणादेवाऽसंभवः पूर्वमेवोक्तः । अपि च—
अपरमार्थदोषमूलवादिना निरधिष्ठानभ्रमासंभवोऽपि दुरुपपादः
भ्रम हेतुभूतदोष दोषाश्रयत्ववदधिष्ठानापरमार्थ्येऽपिभ्रमोपपत्तेः ।
ततश्च सर्वशून्यत्वमेव स्यात् ।
इस अज्ञान के आश्रय का निरूपण करना ही जब असंभव है, तो
अज्ञान की कल्पना भी असम्भव ही है, यह प्रथम ही कह चुके हैं। तथा
जो लोग, भ्रम के मूल दोष को अपारमार्थिक मानते हैं, वह भी, असंगत
है, क्योंकि—निराश्रित असत्य वस्तु पर भ्रम कभी आधारित रही नहीं
सकता । भ्रम का मूल कारण दोष ही यदि असत्यस्वरूप दोषान्तर पर
आश्रित होगा और असत्य अधिष्ठान में ही जब भ्रम होगा तो सब कुछ
शून्य हो जायगा (यही तो बौद्धों का सर्वशून्यवाद का सिद्धान्त है)
यदुक्तमनुमानेनापि भावरूपमज्ञानं सिध्यतीति, तदयुक्तम्, अनुमा-
नासंभवात् । ननूक्तमनुमानम् ? सत्यमुक्तम्, दुरुक्तं तु तत्, अज्ञानेऽ-
प्यनभिमताज्ञानान्तरसाधनेन विरुद्धत्वाद् हेतोः । तत्राज्ञानान्तरा
साधने हेतोरनेकान्त्यम् । साधने च तदज्ञानमज्ञानसाक्षित्वं निवार-
यति । ततश्चाज्ञान कल्पना निष्फला स्यात् ।
जो यह कहा कि—अनुमान से भी भावरूप अज्ञान की सिद्धि होती
है, यह कथन असंगत है—ऐसा अनुमान कभी नहीं हो सकता । यदि
कहो कि—उक्त बात भी अनुमान ही तो है ? ठीक कहते हो, अनुमान
का अनुमान करना भी युक्ति विरुद्ध ही है । अज्ञान में अज्ञानान्तर की
कल्पना तो आपको भी अभिमत नहीं है । अज्ञानान्तर के साधन में अनेक
हेतु हैं, और उस साधन में, अज्ञान साक्षिता की निवृत्ति हो जाती है,
जिससे अज्ञान की कल्पना ही निष्फल हो जाती है ।
दृष्टान्तश्च साधन विकलः, दीपप्रभायाअप्रकाशितार्थप्रकाश
त्वाभावात् । सर्वत्र ज्ञानस्यैव हि प्रकाशत्वम् । सत्यपि दीपे ज्ञानेन