श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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शास्त्र की प्रधानता तथा सगुणवाक्य की अपेक्षा
निर्गुण बोधक वाक्य की प्रधानता का समर्थन ।
“सत्यज्ञानमनन्तं” श्रादि पदों की निर्विशेष वस्तु
मात्र बोधकता का निरूपण और लक्षणा वृत्ति
विचार । सामानाधिकरण्य विचार । भेद प्रतीति की
सत्यता का खण्डन । अनुभूति की सद्रूपता, स्वप्रका-
शता, नित्यता, निर्विकारता, एकता और आत्मता
का समर्थन । विषय विज्ञाता और व्यावहारिक
“अहं” पदार्थ की अनात्मकता का विश्लेषण । पृ०२४-४६
महा सिद्धान्त
१. शांकरमत निरसनः- निर्विशेष वस्तु की
अप्रामाणिकता तथा सविशेष वस्तु ग्राहिता का निरू-
पण । शब्द प्रमाण की सविशेष वस्तु ग्राहिता का
स्थापन, वेदांत सम्मत निर्विकल्प ज्ञान निरूपण
तथा नैयायिक निर्विकल्प ज्ञान का खण्डन ।
२. भेदाभेदवाद का निराकरणः-अनुमान की सविशेष
वस्तु विषयकता का निरूपण । प्रत्यक्ष की सन्मात्र
ग्राहिता का खण्डन तथा भेदवाद में आरोपित दोषों
का प्रत्याख्यान ।
३. शरीर संस्थान की स्थापना, घटादि वस्तु के मिथ्या-
नुमान का खण्डन तथा सत् और अनुभूति की एकता
निराकरण । अनुभूति की स्वप्रकाशता, नित्यता
निर्विकारता और ऐकता का निराकरण । संवित्’
(अनुभूति) की आत्मता का निराकरण तथा “अहं”
पदार्थ की श्रात्मता ज्ञान स्वरूपता और ज्ञानशीलता
का समर्थन । ज्ञाता के मिथ्यात्व का खण्डन, विकार-
शील श्रंतःकरण की ज्ञातृता का निराकरण, परोक्त
ज्ञातृता की व्यवस्था का दोष कथन । संवित् और
आत्मा की अज्ञानाश्रयता का खण्डन । सुषुप्ति आदि
अवस्थाओं में “अहं” पदार्थ के प्रकाश का समर्थन,
मोक्षदशा में भी “अहं” पदार्थ की अनुवृत्ति का
समर्थन ।
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