श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५० )
किसी अन्य अविद्या नाम दोष की कल्पना की आवश्यकता ही क्या है ?
ब्रह्म की दोषता सिद्ध हो जाने से, उसकी स्वाभाविक नित्यता के कारण
दोष से कभी मोक्ष तो हो न सकेगा । इसलिए जब तक ब्रह्म से भिन्न
किसी दोष नामक वस्तु को नहीं माना जाया, तब तक जगत को मिथ्या
या भ्रान्त नहीं कहा जा सकता ।
अनिर्वचनीयत्वं च किमभिप्रेतम् ? सदसद्विलक्षणत्वमिति
चेत्, तथाविधस्य वस्तुनः प्रमाणशून्यत्वेन अनिर्वचनीयतैव स्यात् ।
एतदुक्तं भवति—सर्वं हि वस्तुना तं प्रतीतिव्यवस्थाप्यम् । सर्वा च
प्रतीतिः सदसदाकारा । सदसदाकारायास्तु प्रतीतेः सदसद् विलक्षणं
विषय इत्यभ्युपगम्यमाने सर्वं सर्व प्रतीतेर्विषयस्यात्—इति ।
अनिर्वचनीयता से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ? सद्असद् विलक्षणता
को मानते हो तो, ऐसी वस्तु का कोई प्रमाण नहीं मिलता इसलिए वह
अनिर्वचनीय तो है ही । कथन यह है कि-सारी वस्तुएं प्रतीति के आधार
पर निर्धारित होती हैं, सारी वस्तुएं सद् या असद् रूप में ही होती हैं ।
सद् असद् आकार वाली यदि सद् असद् विलक्षण वस्तु को ही प्रमाणित
करने लगेगी तो कोई भी वस्तु प्रतीति का विषय ही न रह जायगी ।
अथस्यात्—वस्तुस्वरूपतिरोधानकरमान्तरवाह्यरूपविविधाध्या-
सोपादानं सदसदनिर्वचनीयमविद्यानादिपदवाच्यंवस्तुयाथात्म्य
ज्ञान निवर्त्यं ज्ञानप्रागभावातिरेकेण भावरूपमेव किंचिद् वस्तु
प्रत्यक्षानुमानाभ्यां प्रतीयते । तदुपहितब्रह्मोपादानश्चाविकारे स्व-
प्रकाशचिन्मात्रवपुषि तेनैवतिरोहित स्वरूपे प्रत्यगात्मन्यहंकार ज्ञान-
ज्ञेय विभागरूपोऽध्यासः । तस्यैवावस्थारूपेणाध्यासरूपे जगति
ज्ञानबाध्य सर्परजतादिवस्तु तत्तज्ज्ञानरूपाध्यासोऽपि जायते । कृत्स्न-
स्यमिथ्यारूपस्य तदुपादनत्वं च मिथ्याभूतस्यार्थस्य मिथ्याभूतमेव
कारणं भवितुमर्हतीति हेतुबलादवगम्यते । कारणाज्ञानविषयं प्रत्यक्षं
तावत् “अहमज्ञो मामन्यं च न जानामि" इत्यपरोक्षावभासः ।
[email protected]