श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३१ )
अचिन्त्यज्ञानगोचराः, यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्याभाव-शक्तयः,
भवंति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता” इति परिहारश्च न
घटते ।
यदि शास्त्र को निर्विशेष ज्ञानस्वरूप ब्रह्माधिष्ठान प्रतिपादन परक
मानते हैं तो--“निर्गुण, निरवच्छिन्न (असीम) विशुद्ध और विमल
ब्रह्म को सृष्टि संहार कर्त्ता कैसे स्वीकारा जा सकता है”--ऐसी आपत्ति
तथा—जैसे तेजीय वस्तुओं में श्रेष्ठ अग्नि की उष्णता स्वाभाविक
होती है, वैसे ही ब्रह्म की सृष्टि संहार आदि अचिन्त्य शक्तियाँ भी बुद्धि
अगोचर हैं ।' ऐसा परिहार संगत न होगा ।
तथाहि सति—“निर्गुणस्य ब्रह्मणः कथं सर्गादिकर्त्तृत्वं न
ब्रह्मणः पारमार्थिकः सर्गः, अपितु भ्रांतिपरिकल्पितः इतिचोद्यपरि
हरौ स्याताम् । उत्पत्यादिकार्यं सत्वादिगुणयुक्तापरिपूर्णकर्मवश्येषु
दृष्टमिति, सत्वादिगुणरहितस्य परिपूर्णस्याकर्मवश्यकर्मसंबंधानर्हस्य
कथंसर्गादिकर्त्तृत्वमभ्युपगम्यते इति चोद्यम् । दृष्टसकलविस-
जातीयस्य ब्रह्मणो यथोदितस्वभावस्यैव जलादिविसजातीयस्य
अग्न्यादेरौष्ण्यादिशक्तियोगवत् सर्वशक्तियोगो न विरुध्यत इति
परिहारः ।
ऐसी विषम आपत्ति और परिहार की स्थिति में स्वाभाविक
प्रश्न होता है कि फिर-निर्गुण ब्रह्म की सर्गादिकर्त्तृता कैसी है ? ब्रह्म
की वास्तविक सृष्टि नहीं है अपितु भ्रांति परिकल्पित है। ऐसी आपत्ति
और ऐसा परिहार संगत हो जाता है । उत्पत्ति आदि कार्य, सत्व रज, तम
आदि गुण-युक्त अपूर्ण कर्मवश्य ( कर्मलब्ध सुख दुःख अधीन ) वस्तु का
ही देखा जाता है, फिर सत्वादिगुणरहित, कर्मबंधन-रहित, परिपूर्ण ब्रह्म
सर्गादि का कर्त्ता कैसे हो सकता है ? इस शंका का परिहार किया
जाता है कि जल आदि पदार्थों से भिन्न अग्नि की जैसे स्वाभाविक
उष्णता होती है वैसे ही समस्त जगत् से विलक्षण, निर्गुण आदि स्वभाव
संपन्न ब्रह्म का भी सर्वशक्ति संबंध विरुद्ध नहीं है ।
[email protected]