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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

( १११ )
ज्ञानस्वरूपस्यैव तस्य ज्ञानाश्रयत्वं मणिद्युमणिदीपादिवत् उक्तमेव
इत्युक्तम् ।
ऐसा मानने से, ब्रह्म की निर्गुणता मानने वाले वाक्यों से किसी
प्रकार की विरुद्धता भी नही होती । “निर्गुण, संपर्क रहित अखंड, क्रिया-
हीन, शान्त” आदि वाक्य, प्राकृत हेय गुणो से राहित्य के सूचक है ।
ज्ञानमात्र स्वरूप की प्रतिपादक श्रुतियाँ भी ब्रह्म की ज्ञानस्वरूपता को
बतलाती है । वह जो ज्ञान स्वरूपता है, वह केवल निर्विशेष ज्ञान सूचक
नहीं है, अपितु ज्ञाता की ही ज्ञानस्वरूपता की सूचक है। ज्ञान
स्वरूप उस ब्रह्म की ज्ञान स्वरूपता, मणि, सूर्य प्रदीप आदि की
तरह (प्रकाश गुण विशिष्ट) मानना ही सुसगत है, ऐसा पहले कह भी
चुके है ।
ज्ञातृत्वमेव हि सर्वश्रुतयोवदंति- यः सर्वज्ञः सर्ववित्-
तदैक्षत-' सेयंदेवतैक्षत--एईक्षतलोकान्नु सृज इति नित्यो नित्यानां
चेतनश्चेतनानां एको बहूनाथो विदधाति कामान् ज्ञाज्ञौद्वावजावी-
शनीशौ- तमीश्वराणां परमंमहेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्
पतिपतीनां परमं परस्तात् विदामदेवं भुवनेश मीड्यम् नतस्य
कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते, परास्य
शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च-एष
आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः
सत्यकामः सत्यसंकल्पः ।" इत्याद्याः श्रुतयः ज्ञातृत्व प्रमुखान्
कल्याणगुणान् ज्ञानस्वरूपस्यैव ब्रह्मणः स्वाभाविकान्वदंति, समस्त
हेय रहितांच । निर्गुणवाक्यानां सगुण वाक्याना च, विषयमपहत-
पाप्मेत्याद्यपिपास इत्यन्तेन हेयगुणान् प्रतिषिध्य ' सत्यकामः सत्य
संकल्प" इति ब्रह्मणः कल्याणगुणान् विधतीयं श्रुतिरेव विविनक्तीति
सगुणनिर्गुणवाक्ययोर्विरोधाभावादन्यतरस्य मिथ्याविषयताश्रयण-
मपि नाशंकनीयम् ।
ankurn