श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंननु व्यावहारिक प्रमाणप्रमेयव्यवहारो अस्माकमपि अस्ति
एव; कोऽयं व्यावहारिक नाम ? आपात् प्रतीतिसिद्धो युक्तिभिर्निरु-
पितो न तथावस्थित इति चेत्; किंतेन प्रयोजनं ? प्रमाणतया
प्रतिपन्नेऽपि यौक्तिकबाधादेव प्रमाणकार्याभावात् । अथोच्येत-
शास्त्र-प्रत्यक्षयोः द्वयोरप्यविद्यामूलत्वेऽपि प्रत्यक्षविषयस्य शास्त्रेण
बाधोदृश्यते; शास्त्रविषयस्य सद्वितीयब्रह्मणः पश्चात्तनबाधा-
दर्शनेन निर्विशेषानुभूतिमानं ब्रह्मैव परमार्थः इति । तदयुक्तम् अवा-
धितस्यापि दोषमूलस्यापारमार्थ्यनिश्चयात् ।
आपके मत में व्यावहारिक प्रमाण प्रमेयभाव तो स्वीकृत ही है, तो
आप का वह व्यावहारिक स्वरूप क्या है ? यदि कहें कि—हर प्रकार से
प्रतीतिसिद्ध, युक्तियों से जो भलीभाँति निरूपित न हो सके । वाह !
ऐसी वस्तु का प्रयोजन ही क्या है ? जो वस्तु प्रमाण से सिद्ध हो जाय,
फिर भी युक्तियों से सिद्ध न हो सके, वस्तुतः वो प्रमाणित नही मानी
जायगी । यदि कहें कि—‘‘शास्त्र और प्रत्यक्ष दोनों के अविद्यामूलक
होते हुए भी, प्रत्यक्ष विषय का शास्त्र से बाध दिखलाई देता है । शास्त्र
विषय के प्रतिपाद्य सत् स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म के विषय में कोई बाधा
नहीं दीखती, इसलिए निर्विशेष अनुभूतिमान ब्रह्म ही परमार्थ है ऐसा
निश्चित होता है । ‘‘आपका यह कथन भी असंगत है--जो दोषप्रसूत
वस्तु है, वह निर्वाध होते हुए भी अपरमार्थ ही मानी जाती है ।
एतदुक्तं भवति—यथा सकलेतरकाचादिदोष रहित पुरुषां
तरागोचरगिरिगुहासु वसतः तैमिरिकजनस्याज्ञातस्वतिमिरस्य
सर्वस्य तिमिरदोषाविशेषेण द्विचन्द्रज्ञानमविशिष्टं जायते । न तत्र
बाधक प्रत्ययोऽस्तीति न, तन्मिथ्या न भवतीति, तद्विषय भूतं
द्विचेदत्वमपि मिथ्यैव । दोषो हि, अयथार्थज्ञानहेतुः । तथा ब्रह्मज्ञानं
अविद्या मूलत्वेन बाधतज्ञानरहितमपि स्वविषयेण ब्रह्मणा सह
मिथ्यैव इति । भवंति चात्र प्रयोगाः :—‘‘विवाध्यासितं ब्रह्ममिथ्या