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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

प्रथमः निष्यन्दः १३३
‘सोऽयमात्मानमावृत्य स्थितो जडपदं गतः ।
आवृतानावृतात्मा तु देवादिस्यावरान्तगः ।
जडानडस्याप्येतस्य द्वैरूप्यस्यास्ति चित्रता ॥’ (तं० १।१३४-५)
‘पतिप्रमाता’ ‘पशुप्रमाता’ एवं ‘जड़ प्रमेय’ तीनों अपने सभी रूपों में स्पन्दात्मक
स्वभाव के ही स्वस्वरूप हैं । इनका स्वरूप निम्नानुसार है—

१.पतिप्रमाताविशुद्ध, चिद्रूप, अनावृतज्ञातृत्व कर्तृत्व स्वातन्त्र्य शक्तिविश्वात्मक निराकारस्वांग रूप में विश्व का ग्रहणभेदशून्य
२.पशुप्रमाताचिदचिद् अर्द्धावृत अर्द्धानावृतसंकुचित ज्ञान संकुचित क्रियादेह, प्राण पुर्यष्टक शून्यसर्व, रूपों से अभिन्नतादेवता मनुष्य पशु पक्षी
३.प्रमेय जड़वर्गअचित् पूर्णावृत चैतन्य वालाज्ञेय कार्यजड़ पञ्चभूतविमूढ़ता में स्थिति के कारण विसंज्ञसमस्त स्थावर प्रकृति अनन्तभेद
क्षोभावसान से परमपद की प्राप्ति का प्रतिपादन—
निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः ।
यदा क्षोभः प्रलीयेत् तदा स्यात् परमं पदम् ॥ ९ ॥
अपनी (अपने स्वातन्त्र्य से समुत्पादित) (मलात्मक) अशुद्धि से असमर्थ तथा
(वासनात्मक) कर्तव्यों की आकांक्षायें रखने वाले (मितप्रमाता) का ‘क्षोभ’ जब (स्व-
स्वरूप में) लयीभूत हो जाता है । तब उसको ‘परमपद’ प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
इस कारिका के प्रतिपाद्यविषय के बारे में स्पन्दप्रदीपिकाकार कहते हैं—
‘अनेन सर्व स्वातन्त्र्यमुक्तस्य च तद्भवेत् ।
अभिमानात्मकक्षोभक्षयेन त्वन्यमाह च ॥’
  • सरोजिनी *
    ‘निजाशुद्धि’ = ‘निजा सहजा । अनादिर्याऽशुद्धिरविद्याऽविवेकमूला भोगाभिलाष-
    मलरूपतयाऽसमर्थस्य संकुचितशक्तेः ॥’ (स्पन्दप्रदीपिका)
    निजा = स्वात्मीया । अशुद्धि = ‘आणव मल’ । ‘मायीय मल’ । ‘कार्म मल’ ।
    अशुद्धि = अशुद्धियाँ । आणव, मायीय एवं कार्म अशुद्धियाँ ।

१३४ | स्पन्दकारिका
'स्वस्वातन्त्र्योल्लासिता या इयं स्वरूपाविमर्शस्वभावा इच्छाशक्तिः संकुचिता सति
अपूर्णामन्यतारूपा 'अशुद्धि'—तन्मलोत्थित कंचुकपञ्चकाविलत्वात् ।'¹
१. आणव मल—अपनी स्वातन्त्र्योल्लासित स्वरूपाविमर्शस्वभावा जो 'इच्छा
शक्ति है जब वह संकुचित होकर अपूर्णामन्यतारूपा हो जाती है तब इसी मलपंकिल
इच्छाशक्ति ही 'अशुद्धि' कहलाने लगती है । यह अशुद्धि तीन प्रकार की है—१. इच्छा-
शक्ति की अशुद्धि, २. ज्ञानशक्ति की अशुद्धि, ३. क्रियाशक्ति की अशुद्धि ।
२. मायीय मल—ज्ञानशक्ति की अशुद्धिः 'मायीयमल'—जब ज्ञानशक्ति अपने
सर्वज्ञत्व की अनन्त शक्ति को छोड़कर किंचिज्ज्ञत्व (स्वल्प ज्ञातृत्व) को ग्रहणकर लेती है
तब उसके इस संकोच-ग्रहण को ज्ञानशक्ति की अशुद्धि या मायीय मल कहते हैं—
ज्ञानशक्तिः क्रमेण भेद—सर्वज्ञत्व-किंचिज्ज्ञत्व अन्तःकरणबुद्धि इन्द्रियतापत्तिपूर्व
अत्यन्तं संकोचग्रहणेन भिन्नवेद्यप्रथारूपं मायीयं मलम् अशुद्धिरेव ॥³
३. कार्ममल—क्रियाशक्ति की अशुद्धि—'कार्ममल'—जब क्रियाशक्ति की सर्व
कर्तृत्व की शक्ति किंचित्कर्तृत्व में रूपान्तरित हो जाती है तब कार्ममल स्वरूप यह
क्रिया-शक्ति अशुद्धस्वरूप हो जाने के कारण अशुद्ध हो जाती है । इसे ही क्रियाशक्ति
की अशुद्धि कहा जाता है—क्रियाशक्तिः क्रमेण भेदसर्वकर्तृत्वकिंचित्कर्तृत्वकर्मेन्द्रियरूप-
संकोचग्रहण पूर्वं अत्यन्तं परिमिततां प्राप्ता शुभाशुभानुष्ठानमयं कार्ममलं अपि अशुद्धिः ।
निजाशुद्धिरूप जो 'मल' है कोई पृथग्भूत तत्त्व नहीं हैं 'निजाशुद्धि शब्देन 'मलं'
नाम द्रव्यं पृथग्भूतं अस्ति इति ये प्रतिपन्नाः ते दूष्यत्वेन कटाक्षिताः ॥'⁴
मलों से रहित प्राणी ही मुक्त है—वही भैरव है—
मानसं चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्टम् ।
यदा प्रिये परिक्षीणं तदा तद्भैरवं वपुः ॥ (वि०भै०१३८) ।
क्षोभ = प्रकृति का क्षोभ । सीमित प्रमेयों के साथ अपनी एकात्मता या अभिन्नता ।
अशुद्धि जनित विकार । अशुद्धि = देह में अहंभाव ।
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—परमेश्वर के स्वभाव का होने पर संसारी (शरीर-
धारी) प्राणी या आत्मा अपनी पूर्णता के साथ क्यों नहीं दिव्यालोक से प्रकाशित होता ?
वह क्यों आन्तर आत्मबल के स्पर्श की अपेक्षा रखता है?—इसी शंका का निवारण
करने के लिए ग्रन्थकार ने निम्न श्लोक कहा—
'निजाशुद्ध्या समर्थस्य ............ परं पदम् ॥'⁵
अब तक आत्मा के पूर्ण स्वातन्त्र्य का निरूपण किया गया । यदि इसके अभि-
मानात्मक क्षोभ का क्षय हो जाय तो कहना ही क्या ?
अनादि अशुद्धि अविवेकमूला अविद्या भोगाभिलाषा मल से आत्मा की शक्ति को
संकुचित एवं सामर्थ्यहीन बना देती है । फिर उसको अपनी भोगाभिलाषाओं को पूर्ण
१-५. स्पन्दनिर्णय ।

प्रथमः निष्यन्दः १३५
करने हेतु अनेक कर्तव्य करने की इच्छा होने लगती है। यही अज्ञान है 'अनादिर्याऽ-
शुद्धिरविद्याऽविवेकमूला भोगाभिलाषमलरूपतयाऽसमर्थस्य संकुचितशक्तेः ॥'१
श्रीसात्वत नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है कि—अज्ञान, परिच्छिन्नता, सुख-
दुःख—ये सर्वज्ञ आत्मतत्त्व में इसलिए आ जाते हैं क्योंकि वह कर्मचक्र का आलम्बन
ले लेता है। इसे ही दूसरे शास्त्रों में गमनागमन, प्रकृति, अशुद्धि, कर्मवासना, माया,
अविद्या, भ्रम, मोह, अज्ञान एवं मल आदि नामों से कहा गया है—२
'अज्ञता व्यापकत्वं च सुखदुःखादिवेदनम् ।
सर्वज्ञस्यात्मतत्त्वस्य कर्मचक्रावलम्बनात् ।।
गतीस्वेषा प्रकृत्याख्या शुद्धिः प्राक्कर्मवासना ।
मायाऽविद्या भ्रमो मोहोऽज्ञानं मलमिति क्वचित् ॥'३
गीता में भी कहा गया है कि—प्रकृति एवं पुरुष दोनों अनादि हैं। सारे विकार
एवं सारे गुण प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं—
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ।।
'अनादित्वे समानेऽस्या विशेषोऽयं विचारतः ॥'४
प्रकृति और पुरुष की अनादिता समान होने पर भी मायारूप प्रकृति का लय हो
जाता है और आत्मसंवित् ज्यों की त्यों रहती है।
'संवित्प्रकाश' में कहा गया है कि—माया का मायापन यही है कि तत्त्वसाक्षा-
त्कार होते ही मिट जाती है। रज्जु का, ज्ञान होने पर, सर्प, माला आदि मानने का प्रश्न
ही कहाँ ?' और भी कहा गया है—'तुम्हारे अतिरिक्त जो कोई अन्य वस्तु है' इस प्रकार
प्रतीत होता है कि वह विचार करने पर गंधर्व नगर के समान विलीन हो जाती है ।
केवल तुम्हीं शेष रहते हो । इसलिए तुम्हारा नाम शेष है ।'५
मायात्वमेतदेव स्यान्नाशस्तत्त्वप्रदर्शनात् ।
नहि विज्ञातरज्ज्वात्मा सर्पादीन्मन्यते पुनः ॥
त्वत्तो द्वितीयमिहवस्तु यदस्ति किञ्च,
तत्तद्विचार पदवीमवतारितं चेत् ।
गंधर्वपत्तनमिवोपलयं प्रयाति,
त्वं शिष्यसे ध्रुवमतस्तव शेषसंज्ञा ॥६
विद्याधिपति का कहना है कि—समाधि का स्वभाव है—विषय का भोग । जब
युक्तिपूर्वक समाधि लगाने से वह विषय प्रकाश को खा जाती है तब आपकी पदवी हो
जाती है। सर्वभोक्ता और केवल आप ही अभुक्त रह जाते हैं।
भक्षणप्रकृतिना समाधिना युक्तितो विषयधाम्नि भक्षिते ।
सर्वभक्षपदवीमुपेयुषः शिष्यते परमभक्षितो भवान् ॥
१-६. उत्पलदेवाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका ।

१३६ स्पन्दकारिका
वह जादूगर के जादू के समान या ऐन्द्रजालिक की माया के समान अपने बाधक
में ही रहती है। अर्थात् माया मायावी की बुद्धि में कोई भ्रम उत्पन्न नहीं करती—अपने
आश्रय को दुःख नहीं देती।
सा चेन्द्रजालिनो मायेवाऽऽस्थिता बाधकात्मनि ॥
यथाऽग्निर्धूमलेखेव मलवद्दर्पणस्य वा।
बुद्बुदाः सलिलस्येव तच्छान्तौ निर्विकारिता ॥
जैसे अग्नि से धूम्र, जैसे दर्पण पर मल, जैसे पानी में बुलबुले—ऐसा ही उसका
स्वरूप है—फिर निर्विकार ही निर्विकार है—
'बुद्बुदाः सलिलस्येव तच्छान्तौ निर्विकारिता ॥' १
क्षोभ है क्या? क्षोभ है अशुद्धिजन्य विकार। उसका केवल एक ही रूप है—देह
में अहंभाव। विवेक से आत्मबल का स्पर्श होने पर वह नष्ट हो जाता है। तब परम पद
की प्राप्ति अर्थात् अपने स्वरूप में स्थिति होती है। २
षड्धातुसमीक्षा में कहा गया है—मोहमूलक कर्म संसार के कारण होते हैं। मोह
का मिट जाना और कर्म का मिट जाना एक ही बात है। वही सच्ची शान्ति एवं
स्वस्थता है—३
'कर्माणि मोहमूलानि संसृतेः कारणं यतः।
तत्क्षयात् कर्मनिर्मुक्तः स्वस्थः शान्ततमस्ततः ॥'
नारदसंग्रह में कहा गया है कि—जैसे भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता वैसे ही
विकल्परहित चित्त पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। यह क्षोभक्षय अभ्यास से धीरे-धीरे होता
है—४
'यथा सुभर्जितं बीजं नेह भूयः प्ररोहति।
विकल्पक्षीणचित्तस्य तथा भूयो न संसृतिः ॥'
स्वात्मसंबोध में कहा गया है—जैसे किसी पात्र से अग्नि हटा दी जाए तो भी वह
धीरे-धीरे ठण्डा हो जाता है वैसे ही अज्ञान पंक के धुल जाने पर यथा समय कैवल्य की
प्राप्ति होती है—
'यथाग्निपोत्रं ज्वलनोद्धृतं सच्छैत्यं प्रयायाच्छनकैर्न सद्यः।
अज्ञानपंकेऽभिन्नोऽपि तथा निरस्ते कालेन कैवल्यमुपैति देही ॥' ५
षाड्गुण्यविवेक में भी कहा गया है कि—'बोध विचित्र पदार्थों के निर्माण हेतु
किसी दूसरे सहकारी कारण की अपेक्षा नहीं रखता। वह स्वयं संकल्प से ही सहस्रों
रूपों की सृष्टि कर लेता है।
'अविद्याकृतसंकोचगृहीताहंयुतास्य या।
तयाऽभिन्नोऽपि भिन्नोऽयं तत्त्वतः स्वप्नभीतवत्।
अभीत एव यः स्वप्ने विभ्यदभ्येति संभ्रमम्।
१-५. उत्पलदेवाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका।

प्रथमः निष्यन्दः १३७
तस्य स्वप्नादभिन्नस्य को भेदः पारमार्थिकः ॥
तथाहि मिथ्यैव भयं ममेति यदि बुद्ध्यते ।
स्वप्नतत्त्वं परामृश्य भीतिभिर्नैर्न बाध्यते ॥
एवं तन्मय एवाऽहमिति भावनया त्वयि ।
प्रलीनाहंकृतिग्रंथिः पश्यत्येव त्वदात्मताम् ॥'१
आत्मा और परमात्मा में केवल इतना ही भेद बतलाया गया है कि अविद्या के
कारण अहम्भाव का संकोच होने से यह आत्मसंवित् परमात्मा से अभिन्न होने पर भी भिन्न
रूप में भासित है । यथा कोई स्वप्नावस्था में कोई डर जाय । वस्तुतः स्वप्नद्रष्टा निर्भय
है किन्तु वह भय के कारण व्याकुल हो जाता है । क्या स्वप्नद्रष्टा और स्वप्न-दृश्य में
कोई पारमार्थिक भेद है? जब किसी वस्तु को 'मेरी' मान लिया जाता है तब मिथ्या भय
का उदय होता है । 'यह पदार्थ स्वप्नवत् है'—यह समझते ही भय भाग जाता है । इसी
प्रकार 'मैं परमात्मरूप ही हूँ'—इस भावना से जिसकी अहंकार-ग्रंथि नष्ट हो जाती है,
वह अपने को परमात्मस्वरूप ही देखता है ॥'२
संवित्प्रकाश में कहा गया है कि—यह समस्त कर्म तुम्हीं करते हो और तुम्हीं
हो । अहंकार नहीं है तो केवल तुम्हीं शेष हो । अहंभाव ही आत्मा का परमात्मा से भेद
कराने वाला तत्त्व है । वह भावना के अभ्यास से नष्ट हो जाय तो एकता ही एकता
ही है—३
'कर्मेदं त्वत्कृतमपि तन्मयं येन माधव ।
विहीनाऽहंकृति ततस्त्वमेव परिशिष्यते ।
एतावतैव भेदोऽय यदहम्मानिताऽऽत्मनि ।
सा चेद्विलीना त्वद्भक्त्या नष्टो भेदः स्थितैकता ॥'४
निश्चय ही पुरुष अपनी इन्द्रियों को अपने व्यापारों में संलग्न करने हेतु उन्हें
स्वव्यापार में प्रवर्तित करने के लिए ईश्वर भूमिका प्राप्त करने के कारण उसी प्रकार
'स्वातन्त्र्य' प्राप्त कर लेता है । अतः ईश्वर एवं पुरुष दोनों में अभिन्नता का प्रतिपादन
किया गया है । फिर ईश्वर से साम्य रखने वाले पुरुष की ईश्वर से भिन्नता उसका भेद-
निबन्धन कैसे प्रतिपादित किया गया ?
ग्रन्थकार का कथन है कि यह सत्य है कि उस अवस्था में दोनों में अभिन्नता
विद्यमान है किन्तु यह पुरुष अपनी सहज देहादि में आत्मप्रतिपत्ति (आत्मा से अभिन्नता
का स्वीकरण) मूलक रागादिक अशुद्धियों (मलों) के कारण क्षणिक सुख लव का
'अभिलाषी' (इच्छुक) बनकर उसके द्वारा, उन क्षणिक सुखों को पाने हेतु विषयावाप्ति
हेतु 'कर्तव्यों' (क्रियाओं) के निष्पादन में 'असमर्थ' (अशक्त) होकर यह शक्तिदरिद्री
(पुरुष) सुखादिक की इच्छा होने के बाद भी अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर पाता । इस
प्रकार के इस पुरुष का जब (जिस समय) 'क्षोभ' (प्रतिनियत शरीरादिक आलम्बनों में
अहं प्रत्ययात्मक मायीय उपप्लव) विगलित (विनष्ट, विलीन, प्रलयीभूत) हो जाता है
१-४. उत्पलदेवाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका ।

१३८ स्पन्दकारिका
अर्थात् जब कृत्रिम आलम्बनों से मुक्त होकर स्वाभाविक अहं प्रत्यय के सूर्यालोक से क्षोभ
रूपी प्रालेयपटल (हिमसंतति) विगलित हो जाती है—तब निरुत्तर ('परम') स्थान
सद्भाव के द्वारा प्रकाशित हो उठता है ।
तात्पर्य यह है कि आत्मा एवं पुरुष में तथा पर एवं अपर संवित् तत्त्वों में
अभेदावस्था अधिकाधिक संवर्द्धित होती रहे । भाव यह कि स्वस्वभाव में प्रतिष्ठान हो
और अभेदापत्ति हो—
'अभेदः ... ... ... ... ... स्वस्वभावे प्रतिष्ठानम्' ।—
अशुद्धिः = भिन्नभिन्न दर्शनों में पुरुष की भिन्न-भिन्न अशुद्धियों का उल्लेख किया
गया है ।
इस प्रकरण में तो अचित्स्वरूप, अनित्य एवं परतन्त्र देहादिक आत्मेतर पदार्थों में
जो भ्रमात्मक अहंप्रत्यय प्रवर्तित होता है अतः उनके विगलित होने पर स्वस्वभावाभि-
व्यक्तिलक्षणा परा शुद्धि प्राप्त हो जाती है । कहा भी गया है—
'जाते देहप्रत्ययद्वीपभंगे,
प्राप्तैकध्ये निर्मले बोधसिन्धौ ।
अव्यावर्त्येन्द्रियग्राममत्त,
विश्वात्मा त्वं नित्यमेकोऽभासि ॥'
यह भी कहा गया है—
'नात्माधीनत्वेऽपि विश्वं नियोक्तुं,
सर्वो हस्तादीनिवेष्टे यथेष्टम् ।
बालो राजेवात्मशक्त्यप्रबोधात्,
त्वय्यन्तःस्थे सर्वशक्तिस्तु सर्वः ॥'१
'यदोक्षोभः प्रलीयेत्'—जब देहादिक अहं प्रत्यय रूप क्षोभ लीन हो जाता है तब
आत्मा परमपद में प्रतिष्ठित हो जाती है ।'
'अशुद्धि' = देहाद्यात्मप्रतिपत्तिमूलरागादिरूपा' (रामकण्ठ) ।
अशुद्धि = मल । 'क्षोभ' = प्रतिनियत शरीराद्यालंबनाहंप्रत्ययात्मा मायीय उप-
प्लव' (रामकण्ठाचार्य) ॥ परमपद = निरुत्तर स्थान (रामकण्ठ) इस श्लोक में
स्वस्वभाव में प्रतिष्ठा का ही प्रतिपादन किया गया है—'स्वस्वभावे प्रतिष्ठानम् इति अनेन
श्लोकेन प्रतिपादितम् ॥ (रामकण्ठ) ॥
'अशुद्धि' = अचित्स्वरूपों में अनित्य वस्तुओं में (देहादि में) अहं प्रत्यय (राम-
कण्ठ) ।
क्षोभ की शान्ति से स्पन्दोपलब्धि का प्रतिपादन—आठवें स्पन्दसूत्र में कहा
गया था कि—'अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत्' यदि पशु एवं पशुपति में,
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' ।

प्रथमः निष्यन्दः १३९
अणु और शिव में कोई भेद नहीं है तो यह अणु शिव ही क्यों नही बन जाता उसके
समान ('पुरुषस्तत्समो भवेत्') क्यों बनता है? पतिप्रमाता एवं पशुप्रमाता में तात्त्विक
भेद तो नहीं है किन्तु फिर दोनों में भेदाभास होता क्यों है ?
क्षोभ और अशुद्धि—सूत्रकार इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि अपने 'स्वातन्त्र्य'
से उत्पादित सहज अशुद्धि (मल) के द्वारा असमर्थ बने हुए एवं संसार की वासनात्मक
अभिलाषाओं में फँसे हुए मितप्रमाता (पशुप्रमाता) का 'क्षोभ' जब स्वस्वरूप में ही
लयीभूत हो जाए तब उसे 'परमपद' की प्राप्ति होती है। भट्टकल्लट का कथन है—
१. मितप्रमाता को आत्मबल का पूर्ण स्पर्श होने ही नहीं पाता क्योंकि वह वासना-
त्मक अभिलाषाओं के चक्रव्यूह में फँसा रहता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता
है क्योंकि स्वभाव से उत्पन्न अशुद्धि (मल) द्वारा प्रमाता ओत-प्रोत रहता है।
२. देहादिक अनात्म पदार्थों में 'अहं'—इत्याकारक अभिमान, से जात विकल्प
परम्परा ही 'क्षोभ' है। यही 'क्षोभ' मालिन्य, मल, अज्ञान एवं अशुद्धि है। इस क्षोभ के
स्वस्वरूप में लय हो जाने पर तब प्रमाता को 'परमपद' की प्राप्ति हो जाती है।
३. 'परमपद' का प्रतिबन्धक कौन है? 'क्षोभ' ही प्रतिबन्धक है। विद्वानों ने स्पन्द
सूत्र में प्रयुक्त 'अशुद्धि' 'कर्तव्याभिलाषा' 'क्षोभ' इन तीनों का अर्थ लिया है—'आणव
मल' 'कार्य मल' एवं 'मायीय मल'। 'अशुद्धि' = आणव मल। 'कर्तव्य' = कार्ममल
'क्षोभ' = मायीय मल।
अशुद्धि क्या है? 'देहाद्यात्मप्रतिपत्तिमूलरागादि रूप मल'—रामकण्ठाचार्य
क्षोभ क्या है? 'प्रतिनियत शरीराद्यालम्बनाहंप्रत्ययात्मा मायीय उपप्लवः।'
—रामकण्ठाचार्य।
अशुद्धि किसे कहते हैं? 'अनादिर्याऽशुद्धिरविद्याऽविवेकमूला भोगाभिलाषमलंरूप'
—उत्पलदेव।
क्षोभ किसे कहते हैं? 'क्षोभो विकारोऽशुद्धिजनितो देहाहम्प्रत्ययरूपो।'
—उत्पलदेवाचार्य।
'अभिमानात्मकक्षोभ'—उत्पलदेवाचार्य।
इसी क्षोभ के निलीन हो जाने पर 'परमपद' की प्राप्ति होती है। यह 'परमपद'
क्या है? रामकण्ठाचार्य कहते हैं—'प्रलीन देहाद्यहंप्रत्ययलक्षणक्षोभो निवातनिश्छल
जलधिवत सुप्रशान्त स्थितिः आत्मैव परमपद शब्द प्रतिपादितः।।'—रामकण्ठाचार्य॥
'परमपद' = 'निरुत्तर स्थान'—रामकण्ठाचार्य।
भट्टकल्लट इस स्पन्दसूत्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं—
'स चास्य आत्मबलस्पर्शः सहजया अशुद्ध्या व्याप्तस्य कार्यमिच्छतोऽपि न
भवति, किन्तु यदा क्षोभः 'अहमिति' प्रत्ययभावरूपोऽस्य प्रलीयेत्, तदास्य भवति परमे
पदे प्रतिष्ठानम्।'

१४० स्पन्दकारिका
अन्तरात्मा की रंगभूमि पर विश्वाभिनय—पतिभूमिका में प्रतिष्ठित विश्वात्मा एवं
पशुभूमिका में प्रतिष्ठित जीवात्मा (पशुपति एवं पशु) एक ही सत्ता के दो रूप हैं—१.
पूर्ण स्वतन्त्र २. संकुचित स्वातन्त्र्योपहित ये ही इसके दो रूप हैं । 'रंगोऽन्तरात्मा' एवं
'नर्तक आत्मा' कहकर शिवसूत्रकार ने पशुपति को विश्व रूपी महानाट्य का अभिनेता
कहा है । परप्रमाता की नाट्यलीला ही विश्व एवं उसकी सृष्टि है । विश्वरूप महानाट्य का
अभिनय करने के लिए यह नाटककार अपनी 'शिव' निर्बंध 'स्वातन्त्र्य शक्ति' को 'माया
शक्ति' का स्वरूप प्रदान करके, पूर्ण स्वतन्त्र होते हुए भी स्वात्मविस्मृति रूप अख्याति
को धारण करने में 'मितस्वतन्त्र' पशु बनकर, अपनी चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान, क्रिया
की महती शक्तियों को पञ्चकञ्चुकों में रूपान्तरित करके, असीमता, सर्वज्ञता,
सर्वव्यापकता, सर्वकर्तृत्ता आदि को स्वेच्छया भुलाकर, ससीम, अल्पज्ञ आदि बनकर,
सर्वशक्तिमान से 'शक्तिदरिद्री' बनकर, पशुपति से पशु बनकर आरोहण भूमिका से
अवरोहण भूमिका में पदार्पण करके स्वात्मभित्ति के दर्पणस्वरूप रंगमंच पर विश्वमयता के
अवभासन के रूप में विश्वनाट्य का मुकुरनगरवत् अभिनय करता है ।
अभिनेता शिव का विश्वाभिनय—शिव की 'आनन्दशक्ति' के द्वारा ही विश्वो-
ल्लासन होता है अतः विश्व अनन्त आनन्दामृत का उच्छलन है । वही शिव अभेदव्याप्ति
को छिपाकर भेद व्याप्ति ग्रहण कर लेता है, शिव होकर भी, विश्वनाट्य के रंगमंच पर,
जीव बन जाता है । मुक्त होकर भी वह बद्ध बन जाता है । यह 'अशुद्धि' 'क्षोभ'
'अख्याति' 'स्वरूपगोपन' 'आत्मविस्मृति' अवभास अवरोहण' आदि नाटककार एवं नट
परमशिव का एक स्वेच्छाभिनीत अभिनय है । शिव से धरणी पर्यन्त वही विश्वोत्तीर्ण एवं
विश्वात्मक शिव ग्राह्य, ग्राहक आदि अनेक आकारों में अवभासित होकर स्फुरित है उसके
अतिरिक्त अन्य कोई है ही नहीं—
'भगवान्विश्वशरीरः' 'श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं' 'श्रीमत्परमशिवस्य
पुनः विश्वोत्तीर्ण-विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादि धरण्यन्तं
अखिलं अभेदेनैव स्फुरति, न तु वस्तुतः अन्यत् किञ्चित् ग्राह्यं ग्राहकं वा, अपितु श्री
परमशिवभट्टारक एव इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति ।।' (प्र०ह०सू० ३) ॥
वही शिव भी है और वही पशु भी है । जब चिदात्मा परमेश्वर अपनी स्वेच्छा से
अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' द्वारा अपनी अभेद व्याप्ति को निमज्जित करके और भेद व्याप्ति
को ग्रहण करके और अपनी अनन्त व्यापक शक्तियों को संकुचित करके पशुभूमिका पर
अभिनय करने लगता है तो वही मलावृत्त संसारी कहलाने लगता है—
'चिद्वत्तच्छक्तिसंकोचात् मलावृत्तः संसारी ।' (प्र०ह० ९)
आचार्य क्षेमराज इसी तथ्य को अपने शब्दों में इस प्रकार कहते हैं—
'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेद व्याप्तिं निमज्जय भेदव्याप्तिम् अव-
लम्बते तदा तदीया इच्छादिशक्तयः असंकुचित अपि संकोचवत्यो भान्ति, तदानीमेव च
अयं मलावृत्तः संसारी भवति ।' इसके परिणामस्वरूप—
क) इच्छाशक्ति—(संकुचित होकर) अपूर्णम्मन्यता रूप 'आणवमल'

ख) ज्ञानशक्ति—(संकुचित होकर) सर्वज्ञत्व से अल्पज्ञत्व रूप, एवं सङ्कोच-ग्रहण
से संकुचित बनकर 'मायीयमल' बन जाती है ।
ग) क्रियाशक्ति—(संकुचित होकर) अल्पकर्तृत्व बनकर 'कार्ममल' बन जाती है।
इस प्रकार—
सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व, व्यापकत्व शक्तियाँ संकुचित होकर 'कला'
'विद्या' 'राग' 'काल' एवं 'नियति' बन जाती है। श्री सर्वस्वतन्त्र आत्मा शिव संसारी
(पशु) बन जाता है। 'शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते, स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ।।' ('प्रत्य-
भिज्ञाहृदयम्' सूत्र ९ क्षेमराज)
'अशुद्धि'—'निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य' में अशुद्धि क्या है और शिव की सामर्थ्य
(स्वातन्त्र्य शक्ति) क्या है ?
स्वातन्त्र्यवाद—'स्वातन्त्र्यवाद' एवं 'आभासवाद' प्रत्यभिज्ञा की सृष्टि-दृष्टि की
व्याख्या के दो सिद्धान्त हैं। परप्रमाता की दृष्टि से तो 'स्वातन्त्र्यवाद' एवं 'प्रमेय' की
दृष्टि से 'आभासवाद' चरितार्थ है—ज्यादा संगत है—अधिक उपपन्न है।
'स्वातन्त्र्य' शिव की वह पराशक्ति है जो कि उससे अभिन्न है और जिसका अपर
पर्याय 'आनन्द' है। अति दुर्घटकारित्व इसी स्वातन्त्र्य की विशेषता है। यह शिव का
ऐश्वर्य है जो कि स्वातन्त्र्य से अपृथक् है। परमात्मा की इच्छा का निर्बाध, अप्रतिहत,
निर्बंध, एवं अविराम प्रसार उसका 'स्वातन्त्र्य' है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' (१।१) में
कहा गया है—'स्वातन्त्र्यं च नाम यथेच्छं तत्रेच्छा प्रसरस्य अविघातः ।'
यही स्वातन्त्र्य अति दुर्घटकारित्व का चमत्कार है—'एतदेव स्वातन्त्र्यं यदतिदुर्धट-
कारित्वम् ।'
स्वातन्त्र्य—परमात्मा के नित्योदित 'परावाक्' को उसका 'स्वातन्त्र्य' एवं 'ऐश्वर्य'
कहा गया है। यही विमर्शात्मा चिति भी है। शब्दतत्त्व (परावाक्) सृष्टि के प्रसार की
आदि कोटि एवं सृष्टि-सङ्कोच की चरम कोटि है। शिव ही प्रकाशात्मा चिति हैं। दोनों
अविनाभूत हैं। अविभक्त (अन्तर्लीन) विमर्शात्मक शिव 'परमशिव' कहलाते हैं और यह
उनकी निष्कल अवस्था है।
'चिद्रूपाह्लादपरमो निर्विभागः परस्तदा' ('शिवदृष्टि') प्रकाशविमर्शात्मक संवि-
त्स्वरूप भगवान् परमशिव अपनी इसी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' से रुद्रादिक प्रमाता एवं
नीलसुखादिक प्रमेयों के रूप में प्रकाशित होते हैं। यद्यपि शिव का यह अवभासन
अनतिरिक्त है तथापि अतिरिक्तवत् आभासित होता है। इस अवस्था में शिवस्वरूप
आच्छादित नहीं होता। यही है संवित्स्वरूप शिव के स्वातन्त्र्य की महत्ता।
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी' में कहा गया है—'तस्मादनपह्नवनीयः प्रकाश-
विमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवो भगवान् स्वातन्त्र्यादेव रुद्रादिस्थावरान्तप्रमातृरूपतया
नीलसुखादिप्रमेयरूपतया च अनतिरिक्तायापि अतिरिक्तयेव स्वरूपानाच्छादिकया संवि-
त्स्वरूप नान्तरीयक स्वातन्त्र्य महिम्ना प्रकाशते इत्ययं 'स्वातन्त्र्यवादः' प्रोन्मीलितः ॥'

१४२ स्पन्दकारिका
इसी स्वातन्त्र्यशक्ति की महिमा से शिव 'स्वतन्त्र' कहा जाता है—
'स्वतन्त्रश्चितिचक्राणां चक्रवर्ती महेश्वरः ।
संवित्तिदेवताचक्रजुष्टः कोऽपि जयत्यसौ ॥'
उत्पलदेवाचार्य ने 'प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति' में 'स्वतन्त्रता' के निम्न पर्याय प्रस्तुत
करके इसके अनेक पक्षों एवं स्वरूपों पर प्रकाश डाला है । वे कहते हैं कि—'चिति',
'प्रत्यवमर्श', 'आत्मा' 'परावाक्' 'स्वातन्त्र्य' 'ऐश्वर्य' 'स्फुरत्ता' 'महासत्ता' 'सार' 'हृदय'
आदि इसके अनेक अभिधान है—
चितिः प्रत्यवमर्शात्मा, परावाक् स्वरसोदिता ।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्य' तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥
सा स्फुरत्ता महासत्ता, देशकालाविशेषिणी ।
सैषा सारतया प्रोक्ता, हृदयं परमेष्ठिनः ॥'
अभिनवगुप्त 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' में 'स्वतंत्रता' की व्याख्या करते हुए कहते
हैं कि—(१) 'स्वातन्त्र्यं संयोजनवियोजनानुसंधानदिरूपं, (२) 'आत्ममात्रतायामेव जडवत्
अविश्रान्तत्वम् (३) 'अपरिच्छिन्नप्रकाशसारत्वम्' (४) 'अनन्यमुखप्रेक्षित्त्वम्— इति ।'
इन सभी अभिधानो (संज्ञाओं/पर्यायों) में 'स्वातन्त्र्य' ही प्रमुख है—'स्वातन्त्र्य-
मेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा)—उत्पलदेवाचार्य ।
आचार्य अभिनवगुप्त इसकी व्याख्या करते हुए 'स्वातन्त्र्य' का यह स्वरूप
बताते हैं—(१) 'चिद्रूपतया स्वात्मविश्रान्तिवपुषा उदिता सततम् अनस्तमिता नित्या
अहमित्येव, एतदेव परमात्मनो मुख्यं स्वातन्त्र्यम ऐश्वर्यम्, ईशितृत्वम्, अनन्यापेक्षित्त्वम्
उच्यते ॥'१
(२) 'अन्यनिरपेक्षतैव परमार्थतः आनन्दः ऐश्वर्यं, स्वातन्त्र्यं चैतन्यं च ॥२
'स्वातन्त्र्य' के विभिन्न स्वरूपों की मीमांसा—'स्वातन्त्र्य' मात्र दुर्घटकारित्व का
ही सूचक नहीं है । इसी कारण इसके अनेक अभिधान बताए गए हैं यथा—'चिति'
'प्रत्यवमर्श', 'परावाक्' 'हृदय' 'सार' 'ऐश्वर्य' 'आनन्द' आदि । इनमें अन्य अभिधानों
का क्या स्वरूप है?
(१) विमर्श—'विमर्शो हि सर्वसहः परमपि आत्मीकरोति, आत्मानं च परीकरोति,
उभयम् एकीकरोति, एकीकृतं द्वयमपि न्यग्भावयति इत्येवं स्वभावः ।'३
(२) 'प्रत्यवमर्श'—'प्रत्यवमर्शश्च अन्तरभिलापात्मकशब्दंनस्वभावः तच्च शब्दनं
संकेतनिरपेक्षमेव अविच्छिन्नचमत्कारत्मकम् अन्तर्मुखशिरोनिर्देशप्रख्यम् अकारादि मायीय
सांकेतिकशब्दजीवितभूतं, नीलम् इदं, चैत्रोऽहम् इत्यादि प्रत्यवमर्शान्तरभितिभूत-
त्वात् ।४


१. प्रत्यभिज्ञाकारिका (उत्पलदेवाचार्य) । २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी ।
३. ई०प्र०वि० । ४. ई० प्र० वि० ।

प्रथमः निष्यन्दः १४३
(३) परावाक्— परावक्ति विश्वम् अलपति प्रत्यवमर्शेन इति वाक् ।१
(४) स्वरसोदिता—अतएव सा स्वरसेन चिद्रूपतया स्वात्मविश्रान्तिवपुषा उदिता
सततम् अनस्तमिता नित्या अहमित्येव, एतदेव परमात्मनो मुख्यं स्वातन्त्र्यम्, ऐश्वर्यं,
ईशितृत्वम् अनन्यापेक्षित्त्वम् उच्यते ॥२
(५) 'आनन्द' ऐश्वर्यं, स्वातन्त्र्यं चैतन्यं—अनन्यनिरपेक्षतैव परमार्थत आनन्दः,
ऐश्वर्यं, स्वातन्त्र्यं चैतन्यं च ॥३
(६) स्फुरत्ता—इह घटः कस्मात् अस्ति' खपुष्पं च कस्मात् नास्ति?—इति उक्ते
वक्तारो भवन्ति, घटो हि स्फुरति मम, न तु इतरत इति, तत् एतत् घटत्वमेव यदि
स्फुरत्वं स्फुरणसंबन्धः ॥'४
(७) स्पन्द—स्पन्दनं च किंचित् चलनम्, एषैव च किञ्चिद्रूपता यत् अचलमपि
चलम् आभासते इति, प्रकाशस्वरूपं हि मनागपि नातिरिच्यते, अतिरिच्यते इव इति
अचलमेव आभासभेदयुक्तमेव च भाति ॥ उक्तम्—
आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्वपुः ।
अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरत्क्रियः शिवः ॥
तथा— अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन्वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ (स्प० २२)
लोकेऽपि विविधवैचित्र्य योगेऽपि स्वरूपात् अचलन् जनो गंभीरः स्पन्दवान् इति
उच्यते ॥५
(८) 'सत्ता' (महासत्ता) = सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम्ः 'महासत्ता
महादेवी विश्वजीवनमुच्यते ॥'
(९) सार—विमर्शशक्तिः ग्राह्यग्राहकाणां यत् प्रकाशात्मकं रूपं तस्यापि अप्रकाश-
वैलक्षण्या क्षेपिका इयमेव इति श्रीसारशास्त्रेऽपि निरूपितम्—'यत्सारमस्य जगतः सा
शक्तिर्मालिनीपरा ।'६
(१०) हृदय—'हृदय' च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां
चेतनं, तस्यापि प्रकाशात्मत्वं, तस्यापि विमर्शशक्तिः इति विश्वस्य परमे पदे तिष्ठतो
विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परम मन्त्रात्मकं तत्र तत्र अभिधीयते । सर्वस्य मन्त्र
एव हृदयम् । मन्त्रश्च विमर्शनात्मा, विमर्शन च परावाक्छक्तिमयम् ।
अन्ततः पुनः कहना चाहूँगा कि स्वातन्त्र्य निरपेक्ष कर्तृत्व शक्ति है—अनन्य-
मुखप्रेक्षित्व है और यही आत्मा का लक्षण भी 'स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वलक्षणम्
आत्मनः स्वरूपम्—
(१) प्रकाश की मुख्य आत्मा क्या है?—'प्रत्यवमर्श'
१-६. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी ।

१४४ स्पन्दकारिका
'प्रकाशस्य मुख्य आत्मा प्रत्यवमर्शः ॥'१
'आत्मद्रव्यस्य भावात्मकमप्येतज्जडाद्भेदकतया विमर्शाख्यं मुख्यं रूपमुक्तम्'२
स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।३ 'स्फुरत्ता' क्या है? स्फुरत्ता स्फुरणकर्तृता
अभावा-प्रतियोगिनी अभावव्यापिनी ।४
सत्ता क्या है? सत्ता भवत्ता भवनकर्तृता नित्या ।५
प्रत्यवमर्शात्मा क्या है? देशकालास्पर्शात्सैव (स्फुरत्ता) प्रत्यवमर्शात्मा चिति-
क्रियाशक्ति ॥६
हृदय क्या है? (प्रत्यवमर्शात्मा चितिक्रियाशक्तिः) सा विश्वात्मनः परमेश्वरस्य
स्वात्मप्रतिष्ठारूपा हृदयमिति ।७
क्या 'मायाशक्ति' इस 'प्रत्यवमर्श' 'हृदय' 'स्वातन्त्र्य' 'सार' आदि से कोई भिन्न
सत्ता है? नहीं 'माया' है तो 'शक्ति' का ही रूप । यह भी परमशिव की ही एक शक्ति है
किन्तु भेद यह है कि यह भेदावभासिनी शक्ति है—
'प्रकाशात्मनः परमेश्वरस्य मायाशक्त्या स्वात्मरूपं विश्वं भेदेनाभास्यते ॥'८
स्वातन्त्र्य के लक्षण—'स्वातन्त्र्य' आत्मा का स्वरूप है । यह अनन्यमुखप्रेक्षित्व
है— 'स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् ॥'९
सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व परिपूर्णत्व ही स्वातन्त्र्य है—
'चैतन्यमात्मा... चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियामयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम् उच्यते ॥'१०
शैवशास्त्र में 'स्वातन्त्र्यशक्ति' के अनेक लक्षणों का उल्लेख किया गया है जिनमें
प्रमुख लक्षण निम्न हैं—
१) 'स्वातन्त्र्य' एवं 'चैतन्य' पर्यायवाची हैं ।
२) अनन्यमुखापेक्षी सर्वकर्तृत्व । दुर्घटकारित्व । अर्थात्—सृष्टि-स्थिति-संहार-
पिधान-अनुग्रहः ५ कार्य पूर्णज्ञातृता, पूर्णकर्तृता, आत्मनिर्भरता । अहं विमर्शात्मिका
विश्वात्मक स्फुरणा, पूर्णाहन्ता इसके प्रधान लक्षण हैं ।
सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व क्या है? 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' का क्या अर्थ है? पशु-
भूमिका पर 'ज्ञान'—किंचित ज्ञातृत्व एवं 'क्रिया' किंचित्कर्तृत्व है किन्तु पति भूमिका पर
यह सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व अद्वितीय, अप्रतिम, अनुपमेय महाशक्ति है । यह अनन्य-
मुखापेक्षी 'ज्ञातृत्व' एवं अनन्यमुखापेक्षी नित्यात्मक, सार्वभौम, सार्वदेशिक, सार्वकालिक
सर्वात्मक ज्ञान एवं क्रिया है । यह 'ज्ञान' बुद्धि का विलास नहीं है—प्रकृत्योद्भूतअनित्य
ज्ञान नहीं है—सेन्द्रिय ज्ञान नहीं है प्रत्युत् आत्मोद्भूत या चैतन्यस्वरूप ज्ञान है, परमात्मा
की 'ज्ञानशक्ति' है, और 'क्रिया' भी सार्वदेशिक, सार्वकालिक, सार्वभौम, सर्वातिशायी,
१. उत्पलदेवाचार्यः प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति । २. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।
३. प्रत्यभिज्ञाकारिका । ४. प्रत्य० का० वृत्ति ।
५. प्र०का०वृ० । ६. प्र०का०वृ० ।
७. प्र०का०वृ० । ८. प्र०का०वृ० ।
९. अभिनव गुप्त । १०. शि०सू०वि० ।

प्रथमः निष्यन्दः १४५
निर्बंध, निर्बाध, देशकालातीत, नित्य एवं चितिस्वरूप है न कि मात्र ऐन्द्रिय, अनित्य,
संकुचित, अपूर्ण, सापेक्ष, प्रतिबंधित, देशकालावच्छिन्न एवं पशुभूमिक ॥
यह स्वातन्त्र्यमयी विश्वात्मक स्फुरणा, आत्मस्वातन्त्र्य, आत्मनिर्भरता, अपरा-
श्रयता, तथा इसका आत्मभूत पूर्ण ज्ञातृत्व एवं पूर्णकर्तृत्व जो कि अहंविमर्शात्मक
स्फुरणा है। शब्दान्तर में 'चैतन्य' एवं 'स्वातन्त्र्य' पद वाच्य है।
शैव दर्शन में ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व का स्वरूप—सामान्य ज्ञातृत्व (ज्ञान) एवं
कर्तृत्व (क्रिया) से भिन्न है। सामान्यस्तरीय ज्ञान एवं क्रिया यहाँ ज्ञान-क्रिया नहीं है।
ज्ञान एवं क्रिया का अर्थ है—विश्वात्मक स्तर पर प्रत्येक पदार्थ (प्रत्येक सत्ता) का
देशकालनिरपेक्ष संपूर्ण ज्ञान एवं निरपेक्ष तथा देशकाल से अप्रभावित, निर्बंध, सब कुछ
कर सकने एवं करने की पूर्ण कर्तृत्व शक्ति ही 'क्रिया' है। अन्यनिरपेक्ष स्वतन्त्र ज्ञातृत्व
एवं स्वतन्त्र-कर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व—'कर्तुं, अकर्तुं, अन्यथा कर्तुं, की पूर्ण
शक्ति ही 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' है।


पशुप्रमाता का ज्ञान एवं क्रिया—प्रति प्रमाता का ज्ञान एवं क्रिया—
१. अन्य सापेक्ष, देशकालसापेक्ष, परि-१. निरपेक्ष, देशकालसीमातीत, त्रिकाला-
स्थितिमूलक, खण्डित, अनित्य, सेन्द्रिय,बाधित, परिस्थितियों से अप्रभावित,
अपारमार्थिक, किंचित् क्षमतामूलकअखण्ड, निम्न, इन्द्रियातीत, पारमार्थिक,
(सर्वात्मक ज्ञान एवं सर्वात्मक क्रिया केसर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्वमूलक, सर्वात्मक,
विपरीत) विशेष ज्ञान एवं विशेष क्रिया-सार्वदेशिक, सार्वकालिक, सामान्य, सर्व-
मूलक, मित 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' ।जननीन, व्यापक, असीम एवं अक्षर
ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व ॥
२. इन्द्रियसंभूत ।२. इन्द्रिय निरपेक्ष एवं आत्मस्वरूप,
शक्ति स्वरूप ।
३. पञ्चकञ्चुकाविष्ट । ससीम३. पञ्चकञ्चुकों की सीमा-रेखा से अप्रति-
बंधित । असीम ॥
४. पशु-सम्बद्ध । सादि४. पति (शिव) से सम्बद्ध, अनादि ।
५. कृत्रिम एवं सायास ।५. सहज एवं स्वाभाविक ।
६. देहात्मबोधात्मक । सान्त६. आत्मस्वभावात्मक । अनन्त
७. ससीम, सादि, सान्त७. अनन्तप्रवाही, अनाद्यन्त
८. अन्तःकरणस्वरूपात्मक (देहात्मक,८. स्वरूपात्मक, विराट्, असंकुचित,
प्राणात्मक, मनसात्मक, इन्द्रियात्मक, बु-पूर्णाहन्तात्मक; आत्मविमर्शात्मक, पति
द्ध्यात्मक, मित अहङ्कारात्मक), संकुचित,भूमिक आत्ममूलक, विश्वात्मक समष्टि
पशु भूमिक, अनात्मविमर्शात्मक देहादि-मूलक, शक्तिचक्रात्मक
मूलक, व्यष्ट्यात्मक,
९. जड़ात्मक, जड़-चेतनात्मक, भेदा-९. चैतन्यात्मक, सर्वचिन्मयवादमूलक,
त्मक । पुर्यष्टकात्मक, एवं शक्ति चक्रा-अभेदात्मक, पुर्यष्टकातीत, आत्मविभवा-
त्मक (भेद प्रथात्मक) ॥त्मक ।

स्पं० १०

१४६ स्पन्दकारिका
'स्वातन्त्र्य' का अपर पर्याय 'चिति' भी है 'चिति' का अर्थ है चैतन्य। चेतने की
सर्वसामान्य क्रिया ही 'चिति' है—'चितिक्रिया सर्वसामान्य रूपा ।।' (शि०सू०वा०)
'चैतन्य' सर्वज्ञानक्रिया सम्बन्धमय स्वातन्त्र्य है—'चैतन्यं सर्वज्ञानक्रिया, सम्बन्धमयं
परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम्।' (शि०सू०वि०) 'तन्त्रालोक' में 'स्वातन्त्र्य' को इस प्रकार परि-
भाषित किया गया है—चैतन्यमिति भावान्तः शब्दः स्वातन्त्र्यमात्रकम् । अनाक्षिप्तविशेषं
सदाहसूत्रे पुरातने (तन्त्रालोक १.२८) प्रत्यवमर्शात्मकता ही चिति है—'चितिः
प्रत्यवमर्शात्मा' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा)।
चेतने की क्रिया (चिति) संसार के प्रत्येक प्रमाता (ग्राहक) में विद्यमान है। यहाँ
तक कि जड़ पदार्थों में भी इसकी सत्ता है। जो स्वातन्त्र्यपूर्वक किसी भी पदार्थ या व्यक्ति
को जान सके या कार्य कर सके वह चेतन है।
पशु एवं पति के चेतने में क्या भेद है? पशु वर्ग का चेतना मित, सापेक्ष,
अनित्य, देशकालसापेक्ष है किन्तु पति का नहीं। पति में सर्वत्र 'स्वातन्त्र्य' है।
'स्वातन्त्र्य' का अर्थ है—इच्छा, ज्ञान, क्रिया, और आनन्द में पूर्णता। ज्ञान, क्रिया,
विभुता, तृप्ति, नित्यत्व में पूर्णता (निरपेक्ष, निर्बन्ध एवं नित्य पूर्णत्व) ।।
'पंचविधकृत्यकारित्वं चिदात्मनो भगवतः'
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् । अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।'
शिव की अनन्त शक्तियों में प्रमुख शक्तियाँ
[चिति शक्ति] [आनन्द शक्ति] [इच्छा शक्ति] [ज्ञान शक्ति] [क्रिया शक्ति]
स्वातन्त्र्य—(क्षेमराज : शि०सू०वि०—)
'चितिक्रिया सर्वसामान्यरूपा इति चेतयते इति चेततः सर्वज्ञानक्रियास्वतन्त्रः तस्य
भावः स्वातन्त्र्यम् उच्यते ।।'
स्वातन्त्र्यशक्ति—तत्र भालनेत्रं 'स्वातन्त्रशक्तिः', दक्षिणनेत्रं 'प्रमाणशक्तिः',
वामनेत्रं 'प्रमेयशक्तिः' । (प०त्रिं०)
'प्रकाश' = 'प्रकाशश्च अनन्योन्मुख- [स्वातन्त्र्य शक्ति]
विमर्शः अहमिति'

प्रथमः निष्यन्दः १४७
परमात्मा की शक्तियाँ
प्रकाशरूपता स्वातन्त्र्यम् तच्चमत्कार आमर्शात्मकता सर्वाकारयोगित्वं
चिच्छक्तिः आनन्दशक्तिः इच्छाशक्तिः ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः
(ईषत्तया वेद्योन्मुखता
आमर्शः ।)
चिच्छक्ति आनन्द शक्ति इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति क्रिया शक्ति
(स्वातन्त्र्यपूर्ण इच्छा- सर्वज्ञातृत्व सर्वकर्तृत्व
शक्ति का सङ्कोच) | |
आणवमल विद्या कला
(अपूर्णमन्यतात्मक) | |
(वेद्योन्मुखता) मायीय मल कार्ममल
(अल्पज्ञातृत्व) किञ्चित्कर्तृत्व
भेद ज्ञान
पुरुष के ६ कञ्चुक—१. माया, २. कला, ३. राग, ४. विद्या, ५. काल, ६.
नियति ।
शक्ति सङ्कोच की पद्धति एवं अशुद्धियाँ—
सर्वकर्तृत्व सर्वज्ञत्व पूर्णत्व नित्यत्व व्यापकत्व = शक्तियाँ
कला विद्या राग काल नियति शक्ति-सङ्कोच
(अल्प (अल्प अपूर्णत्व (अनि- (अव्यापकत्व (पञ्चकञ्चुक)
कर्तृत्व) ज्ञातृत्व) त्यत्व) मितव्याप्ति)
सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्व-पूर्णत्व-नित्यत्व-व्यापकत्व शक्तयः । सङ्कोच गृहाना यथाक्रमं
'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल' 'नियति' रूपतया भ्रान्ति ।
(क्षेमराज : 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम् : सूत्र ९) ॥
शक्ति-सङ्कोच एवं पशुगत अशुद्धियाँ—'संपूर्ण कर्तृज्ञाद्याः वह्वयः सन्त्यस्य
शक्तयस्तस्य । सङ्कोचात्संकुचिताः कलादिरूपेण । रूठ्यन्त्येनम् । १) तत्सर्वकर्तृत्ता सा
संकुचिता कतिपयार्थमात्रपरा । किंचित्कर्तारममूं कलयन्ती कीर्त्यते कला नाम । २) सर्व-

१४८ स्पन्दकारिका
ज्ञाताऽस्य शक्तिः परिमिततनुरल्पवेद्यमात्रपरा । ज्ञानमुत्पादयन्ती विद्येति निगद्यते बुधैराद्यैः ।
३) नित्यपरिपूर्णतृप्तिः शक्तिस्त ज्ञानमुत्पादयन्ती विद्येति निगद्यते बुधैराद्यैः । ४) नित्य-
परिपूर्ण तृप्तिः शक्तिस्तस्य परिमिता तु सती । भोगेषु रञ्जयन्ती सततममुं राग तत्त्वतां
याता ॥' आचार्य क्षेमराज—'षट्त्रिंशत् तत्त्वसन्दोह' ।
भेदावभासात्मिका, भेदात्मक उल्लासशीला इच्छाशक्ति ही है। 'महामाया' शिव में
अभिन्नतया रहने वाली, निखिल जगत् का उल्लासन करने वाली, शिव के अभेद को
भेदावभासन में परिणत करने वाली शक्ति है 'परानिशा' (महामाया) ॥
महामाया (परानिशा)—'माया—कला—विद्या, राग, नियति, काल ।
'मल' = संकुचित ज्ञान । प्रच्छन्नज्ञानात्मकता = 'मल' । पूर्णत्व की अख्याति =
'मल' । अज्ञान = 'मल' ॥ संसारांकुरकारण = 'मल' ॥ मल, अज्ञान, अभिलाषा,
अविद्या—अविद्या, ग्लानि, विमूढ़ता, पशुत्व आदि सभी 'अशुद्धि' के पर्याय हैं—
मलोऽभिलाषश्चाज्ञानमविद्यालोलिकाप्रथा ।
भवयोषोऽनुप्लवश्च ग्लानिः शोषो विमूढ़ता ॥
अहंममात्मताद्वैधो मायाशक्तिरथावृतिः ।
दोषवीजं पशुत्वं च संसारांकुरकारणम् ॥
तत्त्व—काश्मीरीय शैवदर्शन में ३६ तत्त्वों की मान्यता है जो निम्न है—
१. शिव तत्त्व = १) शिवतत्त्व २) शक्ति तत्त्व = २
२. विद्या तत्त्व = १) सदाशिवतत्त्व, २) ईश्वर तत्त्व, ३) शुद्ध विद्या = ३
३. आत्म तत्त्व = (३१ तत्त्व) । (६) 'माया' (७) कला (८) माया (९) राग
(१०) काल (११) नियति (१२) पुरुष (१३) प्रकृति (१४) बुद्धि (१५) अहङ्कार
(१६) मन (१७-२१) श्रोत्र-त्वक्-चक्षु-जिह्वा-घ्राण (२२-२६) -वाक्-पाणि-पाद-पायु-
उपस्थ (२६-३१) शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध । (३२-३६) आकाश-वायु-वह्नि-सलिल-
भूमि ।
'शिवतत्त्व' (अहंविमर्श) 'सदाशिवतत्त्व' (अहमिदं विमर्श) 'ईश्वरतत्त्व' (इमिदं
विमर्श)—इनमें प्रथमपद की प्रधानता है। 'सद्विद्या'—(अहं एवं इदं दोनों का समभावेन
प्राधान्य) 'माया शक्ति'—अहं एवं इदं में पृथक्त्वः (क) अहमंश = पुरुष (ख) इदमंश
= प्रकृति ॥ 'शिव' का 'पुरुष' रूप में रूपान्तरण—(माया द्वारा पाँच उपाधियों की सृष्टि
जिससे कि 'शिव' पशु बन सके ।—पञ्च कञ्चुक—'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल'
'नियति' ।
'आत्मतत्त्वों' (३१ तत्त्वों) में प्रथम तत्त्व 'माया' है और उसी से उत्पन्न होते हैं
'पञ्चकञ्चुक' ॥ 'मायाशक्ति'—पञ्चकञ्चुक ॥ 'प्रकृति' तेरहवाँ तत्त्व है । माया—'पञ्च-
कञ्चुक' ।
परमेश्वर की ५ शक्तियाँ—(१) 'चित्' (२) 'आनन्द' (३) 'इच्छा' (४) 'ज्ञान'

प्रथमः निष्यन्दः १४९
(५) 'क्रिया' अपने को स्वतन्त्र बोध करना तथा अविघात इच्छासम्पन्न समझना =
'इच्छाशक्ति' ॥ स्वातन्त्र्य = 'आनन्द शक्ति' ॥ 'चित् शक्ति' = प्रकाश ॥ 'ज्ञान
शक्ति' = आमर्श ॥ (आमर्श = वेद्य पदार्थ का सामान्य ज्ञान) ॥
क्रियाशक्ति = सर्वाकार धारण करने की योग्यता इन्हीं पञ्चशक्तियों द्वारा परमशिव
द्वारा स्वभित्ति (शक्ति) पर जगत् का अवभासन ।
सांख्यदर्शन—पुरुष, प्रकृति नित्य हैं ।
शैव दर्शन—पुरुष, प्रकृति अनित्य हैं ।
१) चित् शक्ति (प्रकाशात्मक—इसी के द्वारा शिव अपने को स्वप्रकाश समझते
हैं।
२) आनन्दशक्ति = इसके द्वारा शिव अपने में आनन्द का साक्षात्कार करते हैं ।
३) इच्छाशक्ति = इसके द्वारा शिव जगत् की सृष्टि, संहार एवं अन्य कार्य
निष्पादित करते हैं ।
४) ज्ञानशक्ति = इसके द्वारा शिव स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं ।
५) क्रियाशक्ति = इसके कारण शिव सभी स्वरूपों को धारण कर सकते हैं ।
जगत् = शिव की शक्तियों का विस्तृत रूप । 'विश्व' शक्ति-प्रचय है (शिवसूत्र) ।
इसी शक्ति के द्वारा शिव को 'अहं' का बोध हो पाता है । 'शक्ति' में उन्मेष—सृष्टि,
'शक्ति' में निमेष—प्रलय । 'उन्मेष'—सदाशिव तत्त्व । शैवदर्शन—'सृष्टि' = शक्ति का
उन्मेष ।
स्वातन्त्र्य = ज्ञान एवं क्रिया का स्वतन्त्र (अनन्यमुखापेक्षी) कर्तृत्व । सृष्टि-स्थिति-
संहार-पिधान और अनुग्रह के दुर्घट कार्यकारित्व, दुर्घट कार्यज्ञातृत्व । स्वातन्त्र्य =
अनन्यमुखापेक्षी सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व । आत्मस्वभाव पूर्णज्ञातृत्व एवं पूर्णकर्तृत्व की
अहंविमर्शात्मिका विश्वात्मक स्फुरणा = 'स्वातन्त्र्य' 'आत्मा' 'चैतन्य' आदि ।
'पशुभूमिका' एक साथ, सर्वत्र, निरापद, निर्बंध एवं निरपेक्ष समस्त कार्य करना
एवं जानना असंभव है क्योंकि पशु अस्वतन्त्र, सीमाबद्ध एवं परमुखापेक्षी है । यही
स्वातन्त्र्य है—
'स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् । (ई०प्र०वि०)
पशु में चितिक्रिया (चेतने की क्रिया । स्वातन्त्र्यात्मक नहीं है । विश्वात्मक स्तर पर
ज्ञानक्रिया समन्वित चेतने की क्रिया का अशेष एवं अनन्यमुखापेक्षी कर्तृत्व ही परमेश्वर
का 'ऐश्वर्य' एवं 'पूर्ण स्वातन्त्र्य' है । यह स्वातन्त्र्य देशकालातीत है । परमात्मा प्रत्येक
क्षण, सब कुछ, कहीं भी, एक साथ (बिना किसी की सहायता के तथा बिना किसी भी
बाधा के) सब कुछ कर सकता है एवं सब कुछ जान सकता है किन्तु पशुभूमिक जीव
नहीं है ।
अविराम स्पन्दात्मक 'पतिप्रमाता' का यथार्थ स्वस्वरूप क्या है? समस्त विश्व के

१५० स्पन्दकारिका
समस्त पदार्थों का आधारभूत एवं सबकी अन्तिम विश्रान्तस्थली है 'स्वतन्त्रता' एवं
अखण्डस्पन्दात्मिका संवित् शक्ति । चितिक्रिया की प्रक्रिया क्या है? यह स्थूल क्रियावत्
नहीं है । प्रत्युत् यह आभ्यन्तरिक साङ्कल्पिक गतिमयता है—यह है अहंप्रत्यवमर्शात्मक
सामान्यस्पन्द । विमर्शात्मकता ही इसका अभिन्न स्वभाव है और यही है, जड़ एवं चेतना
की व्यावर्तक रेखा । ज्ञान एवं क्रिया शक्ति (प्रकाश-विमर्श) पृथक्-पृथक् पदार्थ नहीं है
प्रत्युत् ये स्पन्दात्मिका चितिशक्ति का ही रूपान्तर है । 'क्रिया' ज्ञान का ही उत्पाद
(विकास) है । 'ज्ञान' क्रिया का पूर्ववर्ती स्वरूप है । 'प्रकाश' (शिव) बहिर्मुखदशा में
'विमर्श' (शक्ति) है और ही अन्तर्मुख दशा में 'प्रकाश' (शिव) है । 'इदं' अह का फल
है—अहं की फसल है । 'इदं' अहं का स्थूलतर विकास है । 'अहं' एक बीज है और
'इदं' है उसका अंकुर ।
स्पन्दात्मक शिव अपने भीतर अभेद रूप में जगत् को अवस्थित रखता है ।
'जगत्' शिव का विराट् प्रसार है ।
'स्वातन्र्य' मुख्यतः कर्तृतास्वरूप है । विश्वात्मा स्वयं द्वारा आविर्भूत मल
(अशुद्धि) के द्वारा आत्मस्वरूप को आंशिक रूप में आच्छादित करके तथा जड़ वर्ग को
सम्पूर्णतः आच्छादित करके स्थित है । यह 'स्वातन्त्र्य' किसी को पूर्णतः अस्वतन्र कर
देता है तो किसी को अंशतः ।
अशुद्धि—'निज शुद्ध्यासामर्थ्यस्य'—जो अपनी अशुद्धियों के कारण ही असमर्थ
हो चुका हो ऐसे व्यक्ति का । 'अशुद्धि' = आणव मल । 'कर्तव्य' = कार्म मल ।
'क्षोभ' = मायीयमल । 'अशुद्धि' ही है अख्याति; मल, बन्ध या अविद्या । स्वतन्त्र
स्वभाव का अज्ञान, पशुत्व, आत्मविस्मृति, शिवत्व के स्थान पर पशुत्व से तादात्म्य ही
'अशुद्धि' है । 'ज्ञानं बन्धः' (शिवसूत्र) में 'ज्ञान' अज्ञानमात्र का सूचक नहीं प्रत्युत्
यथार्थ आत्मस्वभाव का अज्ञान है । 'अज्ञान' वह आत्मगोपनात्मिका स्थिति है जिसमें
अपने स्वस्वरूप का आच्छादन करके मितात्मा शिव पति से च्युत होकर पशु बन जाता
है । इसमें आत्मा स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा अपने ही स्वतन्त्र स्वरूप को छिपाकर-स्वात्म
विस्मृतिरूपात्मक आच्छादन ओढ़ लेता है ।
'स्वातन्त्र्यशक्ति' प्रतिक्षण पाँच रूपों में स्पन्दायमान है और उसके पाँच रूप
निम्नांकित हैं—१. 'चित' २. 'आनन्द' ३. 'इच्छा' ४. 'ज्ञान' एवं ५. 'क्रिया' । इसे
ही सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व एवं व्यापकत्व भी कह सकते हैं । शक्ति पञ्चक
द्वारा सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान एव अनुग्रहरूपात्मक पञ्च कृत्यों का अनवरत निष्पादन
किया जाता रहता है । अपने आनन्दस्वभाव के कारण चैतन्य की प्रकृति ही है विश्वरूप में
अनवरतावभासन । चैतन्य का स्वभाव है—संसारभाव का अवभासन । आत्मा संसार की
भूमिका पर अभेद व्याप्ति का विस्मरण करके भेद-व्याप्ति ग्रहण कर लेता है ।
स्वातन्त्र्य-रत्नाकर में निःशेष विश्व अभेदात्मक 'अहं' के रूप में अवस्थित है ।
'अहं' को 'इदं' के रूप में अवभासित करने की अभिलाषा ही प्रथम मल है । चूँकि समस्त
वैश्विक-विस्तार (जागतिक कल्पना) स्वस्वरूप में शाश्वतिक रूप में अवस्थित है और वह

प्रथमः निष्यन्दः १५१
भी अभेदात्मक रूप में, — अतः उसकी भेदात्मक रूप में अभिलाषा करना—पूर्ण को
अपूर्ण रूप में देखने की आकांक्षा करना एक ‘अशुद्धि’ या ‘मल’ ही तो है । यह अपूर्णता
ही—‘आणव मल’ ‘मायीय मल’ एवं ‘कार्ममल’ के रूप में विद्यमान है ।
पतिप्रमाता अपने स्वातन्त्र्य शक्ति से पशुभूमिका स्वीकार करके ‘शक्तिदरिद्री’ बन
जाता है । मलत्रय में जो ‘आणव मल’ नामक अशुद्धि है उसके दो भेद हैं—
१) स्वातन्त्र्य की हानि (पूर्णज्ञातृत्व का संकोच)—‘स्वातन्त्र्य हानिवार्धस्य’
२) स्वातन्त्र्य का अबोध (पूर्णज्ञातृत्व का मिथ्याभिमान)
‘स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता’ (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा) ‘स्वातन्त्र्यहानिर्ज्ञातृत्वसंकोचः’
(ईश्वरप्रत्यभिज्ञा)
‘निज अशुद्धि’ (का० ९) आत्मा को आच्छादित करने वाले एवं अन्तःकरण को
मलिन बनाने वाले ‘मल’ है । इसे ही आचार्य शङ्कर ने ‘अविद्या’ कहा है । बौद्धों ने भी
बन्धन की द्वादश श्रृंखलाओं में इसे प्रथम स्थान दिया है—
‘अविज्जा पच्चया संखाण, संखार पच्चया विञ्जाणं ......
अज्ञान ज्ञानाभाव नहीं है प्रत्युत् अपूर्ण ज्ञान हैः—त्रिक-सिद्धान्त शैव-शाक्त
तांत्रिकों ने इस ‘अज्ञान’ को मलात्मक माना है । ‘मल’ तीन प्रकार के हैं—१) आणव
मल २) मायीय मल ३) कार्म मल ॥
अशुद्धि का कारण क्या है?—अशुद्धि का कारण असत् तत्त्वों में सत्त्व,
अचित् में चित्, अनात्म में आत्मा, अशुचि में शुचि अनित्य में नित्य एवं दुःख में सुख
आदि की प्रतीति है । यह अध्यासात्मक एवं अध्यारोपजन्य है । यह मिथ्याप्रतीति का
परिणाम है ।
अशुद्धि का कारण आणवादिक मल भी हैं ।
मालिनीविजयोत्तरतन्त्र का मत—संसारांकुर अज्ञान ही ‘मल’ हैं—
‘मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम्’ (मा० वि० प्र० अधिकार) ‘महार्थमञ्जरी’
का मत— ‘मल’ ही प्रधान अशुद्धि है— ।
मालिनीविजय : अज्ञान कैसा होता है?
१. अज्ञान ही मल है । २. यही संसार के अंकुर का कारण है । ३. अज्ञान
अंधकार है । पारमेश्वर स्वातन्त्र्य की अनुभूति ‘स्व’ रूप का यह गोपन करता है । ४.
आत्मा एवं अनात्मा सम्बन्धी व्यर्थ की डाझनों में डालने वाला होता है । ५. अपूर्ण ज्ञान
ही ‘अज्ञान’ है । इसे ‘आणवमल’ भी कहते हैं—‘अज्ञानं तिमिरं पारमेश्वरस्वातन्त्र्यमात्र-
मुल्लासितस्वरूपगोपनासत्तत्त्वमात्मानात्मनोरन्यथाभिमानस्वभावम् अपूर्ण ज्ञानं तदेव चाणवं
मलम् ॥’ (तन्त्रालोकः विवेक प्र०आ०श्लोक २३)
अभिनवगुप्तपादाचार्य का मत—
मलमज्ञानभिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।

१५२ स्पन्दकारिका
इति प्रोक्तं तथा च श्रीमालिनीविजयोत्तरे ॥ (१।२३)
'अज्ञानं' संसृतेर्हेतुर्ज्ञानं मोक्षैककारणम् ॥ (तन्त्रलोक १।२२)
'मिथ्याज्ञान' संसार का कारण है । इसके विपरीत 'तत्त्वज्ञान' है । इससे अज्ञान
दूर होता है और मोक्ष प्राप्त होता है—
'मोक्ष एव उपादेयः तत्प्रतिपक्षभूतः संसारश्च हेयः । तस्य च मिथ्याज्ञानं निमित्तं,
तत्प्रतिकूलं च तत्वज्ञानम् । (विवेक)
निजाशुद्धासमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः ।
यदा क्षोभः प्रलीयेत ततः स्यात् परमं पदम् ॥
'परमपद' 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र' के अष्टादशोऽधिकार में कहा गया है—
निरोधं मध्यमे स्थाने कुर्वीत् क्षणमात्रकम् ।
पश्यते तत्र चिच्छक्तिं तुटिमात्रामखण्डिताम् ॥ (१८।३७)
तदेव परमं तत्त्वं तस्माज्जातमिदं जगत् ॥
प्राप्नोति परमं स्थानं भुक्त्वा सिद्धिं यथेप्सिताम् ॥ ४३)
'अशुद्धि' क्या है? 'तन्त्रालोक' (४।१९८) में कहते हैं कि —
१) यह समस्त दृश्यादृश्य अस्तित्व ब्रह्म ही तो है । देह आदि समस्त वस्तु तत्त्व
परब्रह्मात्मक ही तो है फिर कैसी शुद्धि कैसी अशुद्धि? इसका उत्तर देते हुए अभिनव-
गुप्त कहते हैं—
सबके शिवात्मक होने पर भी यह भेदप्रदा बुद्धि ही अशुद्धि बन जाती है । बुद्धि
का परिष्कार ही शुद्धि है—
शिवात्मकेष्वप्येतेषु शुद्धिर्या व्यतिरेकिणी ।
सैवा शुद्धिः पराख्याता शुद्धिस्तद्धीविमर्दनम् ॥ (४।१९८)
शुद्धि एवं अशुद्धि में भेद क्या है ? परतत्त्व से शून्य वस्तु ही अशुद्ध है
अन्यथा कुछ भी अशुद्ध नहीं है—
अशुद्धं नास्ति तत्किंचित्सर्वं तत्र व्यवस्थितः ।
यतेन रहितं किंचिदशुद्धं तेन जायते ॥ (विवेक २.८९)
'अभिलाषा' क्या है । 'अभिलाषा' एक मल है ।
'अभिलाषो मलोऽत्र तु' (स्वच्छन्द० ४-१०४) ।
शून्यप्रमाता 'अभिलाषा' रूपी मल के प्रभाव से आणवमल ग्रस्त हो जाता है ।
मेय को स्वीकार करके भेदवाद की भूमि पर गिर पड़ता है । विमर्श के कारण में उच्छलन
प्रारंभ होता है ।
स एव स्वात्मा मेयेऽस्मिन्भेदिते स्वीक्रियोन्मुखः ।
पतन्समुच्छलत्वेन प्राणस्पन्दोर्मिसंज्ञितः ॥ (६।११)