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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 519 में से

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पृष्ठ 235

१३४ | स्पन्दकारिका
'स्वस्वातन्त्र्योल्लासिता या इयं स्वरूपाविमर्शस्वभावा इच्छाशक्तिः संकुचिता सति
अपूर्णामन्यतारूपा 'अशुद्धि'—तन्मलोत्थित कंचुकपञ्चकाविलत्वात् ।'¹
१. आणव मल—अपनी स्वातन्त्र्योल्लासित स्वरूपाविमर्शस्वभावा जो 'इच्छा
शक्ति है जब वह संकुचित होकर अपूर्णामन्यतारूपा हो जाती है तब इसी मलपंकिल
इच्छाशक्ति ही 'अशुद्धि' कहलाने लगती है । यह अशुद्धि तीन प्रकार की है—१. इच्छा-
शक्ति की अशुद्धि, २. ज्ञानशक्ति की अशुद्धि, ३. क्रियाशक्ति की अशुद्धि ।
२. मायीय मल—ज्ञानशक्ति की अशुद्धिः 'मायीयमल'—जब ज्ञानशक्ति अपने
सर्वज्ञत्व की अनन्त शक्ति को छोड़कर किंचिज्ज्ञत्व (स्वल्प ज्ञातृत्व) को ग्रहणकर लेती है
तब उसके इस संकोच-ग्रहण को ज्ञानशक्ति की अशुद्धि या मायीय मल कहते हैं—
ज्ञानशक्तिः क्रमेण भेद—सर्वज्ञत्व-किंचिज्ज्ञत्व अन्तःकरणबुद्धि इन्द्रियतापत्तिपूर्व
अत्यन्तं संकोचग्रहणेन भिन्नवेद्यप्रथारूपं मायीयं मलम् अशुद्धिरेव ॥³
३. कार्ममल—क्रियाशक्ति की अशुद्धि—'कार्ममल'—जब क्रियाशक्ति की सर्व
कर्तृत्व की शक्ति किंचित्कर्तृत्व में रूपान्तरित हो जाती है तब कार्ममल स्वरूप यह
क्रिया-शक्ति अशुद्धस्वरूप हो जाने के कारण अशुद्ध हो जाती है । इसे ही क्रियाशक्ति
की अशुद्धि कहा जाता है—क्रियाशक्तिः क्रमेण भेदसर्वकर्तृत्वकिंचित्कर्तृत्वकर्मेन्द्रियरूप-
संकोचग्रहण पूर्वं अत्यन्तं परिमिततां प्राप्ता शुभाशुभानुष्ठानमयं कार्ममलं अपि अशुद्धिः ।
निजाशुद्धिरूप जो 'मल' है कोई पृथग्भूत तत्त्व नहीं हैं 'निजाशुद्धि शब्देन 'मलं'
नाम द्रव्यं पृथग्भूतं अस्ति इति ये प्रतिपन्नाः ते दूष्यत्वेन कटाक्षिताः ॥'⁴
मलों से रहित प्राणी ही मुक्त है—वही भैरव है—
मानसं चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्टम् ।
यदा प्रिये परिक्षीणं तदा तद्भैरवं वपुः ॥ (वि०भै०१३८) ।
क्षोभ = प्रकृति का क्षोभ । सीमित प्रमेयों के साथ अपनी एकात्मता या अभिन्नता ।
अशुद्धि जनित विकार । अशुद्धि = देह में अहंभाव ।
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—परमेश्वर के स्वभाव का होने पर संसारी (शरीर-
धारी) प्राणी या आत्मा अपनी पूर्णता के साथ क्यों नहीं दिव्यालोक से प्रकाशित होता ?
वह क्यों आन्तर आत्मबल के स्पर्श की अपेक्षा रखता है?—इसी शंका का निवारण
करने के लिए ग्रन्थकार ने निम्न श्लोक कहा—
'निजाशुद्ध्या समर्थस्य ............ परं पदम् ॥'⁵
अब तक आत्मा के पूर्ण स्वातन्त्र्य का निरूपण किया गया । यदि इसके अभि-
मानात्मक क्षोभ का क्षय हो जाय तो कहना ही क्या ?
अनादि अशुद्धि अविवेकमूला अविद्या भोगाभिलाषा मल से आत्मा की शक्ति को
संकुचित एवं सामर्थ्यहीन बना देती है । फिर उसको अपनी भोगाभिलाषाओं को पूर्ण
१-५. स्पन्दनिर्णय ।