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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 519 में से

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पृष्ठ 73

७२ स्पन्दकारिका
उपायों एवं समावेशों का 'तन्त्रालोक' (३ से १२ आ०) 'तन्त्रसार' (पृ० १०-
११४) 'महार्थमंजरी' (५६-५९) 'परिमल' (पृ० १३८-१५३) 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र'
(द्वि० आ० १३-४४) में विवेचन किया गया है ।
सारांश—'आणव उपाय' : उच्चार, करण, ध्यान, वर्ण, स्थान-कल्पना का
अभ्यास । 'आणव समावेश'—किसी एक अभ्यास से प्राप्त होने वाली एकाग्रता ॥
'अणु' = मितप्रमाता, जीव, सकल । परिमित स्वरूप वाले बुद्धि, प्राण, देह, देश,
ध्यान, करण आदि को उपाय के रूप में ग्रहण करने वाले ॥ इसीलिए इसके उपाय की
संज्ञा है—'आणव उपाय' ॥ आणवोपाय में—'ध्यान' बुद्धि का व्यापार है ।
'प्राण' स्थूल-सूक्ष्म भेद से द्विविध रूप वाला है ।
'स्थूल प्राण' का व्यापार = 'उच्चार' प्राणवृत्तियों के रूप में अवस्थित,
'सूक्ष्मप्राण' = 'वर्ण' ।
'करण'—शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में रखना ॥
'स्थान-कल्पना' = घट-स्थापन, मण्डल-निर्माण, मन्दिर, मूर्ति, चित्र आदि की
रचना आदि विधियों का समावेश ॥
'ध्यान' = सगुण स्वरूप में चित्त की एकाग्रता ।
'उच्चार' = प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान आदि के श्वास-प्रश्वास, छींक
(क्षुत्) प्रभृति प्राण-वृत्तियाँ ।
'वर्ण'—प्राणोच्चार के साथ स्वाभाविक रूप से उच्चरित 'सकार'-'हकार'
ध्वनि = 'वर्ण' ॥ ये सभी वर्णों एवं मन्त्रों के बोधक हैं । 'वर्ण' पीत-अरुण आदि रंगों
के भी बोधक ॥
'करण' के भेद ('तन्त्रालोक' में 'त्रिशिरोभैरव' का उल्लेख करके उद्धृत ७
करण—
ग्राह्य ग्राहक संवित्ति संनिवेश व्याप्ति आक्षेपं त्याग
('तन्त्रालोक' के ११, १५, १६, २९ एवं ३२ आह्निक में सविस्तृत विवेचन)
'स्थान-कल्पना'—हृदय के स्पन्दनात्मक प्राणशक्तिमूलक सामान्य व्यापार में
शरीरस्थ नाड़ी-चक्र में एवं बाह्य लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि में स्थान-कल्पना की
जाती है ।
सामान्य स्पन्द तत्त्व का उन्मेष → षडध्वं-स्फुरण । सबसे पूर्व परमेश्वर का
'काल' नामक स्वरूप भासित होता है और यह परमात्मस्वरूप अभेदावस्था में
'काली-शक्ति' एवं भेदावस्था में 'प्राणशक्ति' कहलाता है ।
संवित्स्वरूपा काली शक्ति में स्वेच्छानुसार क्रमाक्रम (क्रम+अक्रम) रूपों में
भासनार्थ क्रिया शक्ति का उन्मेष । क्रियाशक्ति का प्रथमोन्मेष = प्राण-व्यापार । 'प्राक्
संवित् प्राणे परिणता ।'