स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
DevanagariHindipublished519 पृष्ठ
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७० स्पन्दकारिका
‘मल’ = शिवता का आवरक, स्व का चिदात्मक उल्लास का आवरक, शिव के
दृक् (ज्ञान) क्रिया शक्तियों को संकुचित करने वाला ।। पशुपति → पशु ।
शिव के ६ रूप—१. भुवन, २. विग्रह, ३. ज्योति, ४. आकाश, ५. शब्द,
६. मन्त्र ।
भुवनं विग्रहो ज्योतिः खं शब्दो मन्त्र एव च ।
बिन्दुनादादिसंभिन्नः षड्विधः शिव उच्यते ॥ (१।६३)१
बिन्दुनादस्तथा व्योम मन्त्रो भुवनविग्रहो ।
षडवस्वात्मा शिवो ध्येयः फलभेदेन साधकैः ॥
इस शिव का एक ही स्वभावभूत धर्म है—‘अहंप्रत्यवमर्श’ ‘अहंप्रत्यवमर्शाख्यो हि
स्वभावभूतो धर्मोऽस्ति ॥’२
‘स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः (प्र०१। अ०५। आ०१३)
परमात्मा का स्वातंत्र्य ही उसका मुख्य ऐश्वर्य है । यही उसकी शक्तिमत्ता का
द्योतक है । उसकी शक्ति इच्छा है—
या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।
इच्छात्वं तस्य सा देवि सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥३
परमात्मा की यह शक्ति केवल एक है फिर भी नानारूपावभासित है । पुरुष का
अज्ञान = ‘मल’ है । ‘मल’ = शिव से उद्भूत है । यह मल स्व के चिदात्मक उल्लास
का अवच्छेदक या आवरक है ।
आत्मा मलिन कैसे होती है ? (नेत्रतन्त्र)—
तत्संबंधात्समलिनो ह्रस्वतन्त्रोऽप्यशक्तिमान् ।
अविशुद्धो ह्यसौ तस्मान्मलत्रय निरोधतः ॥ १४६ ॥ (नेत्रतन्त्र)४
‘आणव मल’—चिन्मय के साथ मल योग कैसे ?
निर्मलो वा कथं सक्तो भोगेषु एतद्विरुध्यते ।
शुद्धो भोगी न सिद्धयेत्तु विकल्पो भोग उच्यते ॥ (१४७ नेत्रतन्त्र)५
विकल्पमात्र संसारः पशोः संसरणं सदा ।
संसार्यस्य च बद्धस्य निर्मलत्वं न युज्यते ॥ (१४८) (ने०तं०)
१. पूर्णचिदानन्दघनस्य विशुद्धस्य कथमशुद्धभोगाकांक्षा स्यात् ?
२. माया शक्त्या उल्लासित अपूर्णामन्यतात्मकं आणवमलभाज एव ‘किचिन्मे-
स्यात्’ इति रागत्वात्मा अभिलाषो घटते । (ने०तं०)
३. शुद्धस्य चिदानन्दघनस्य न सुखदुःखप्रतिपत्यात्मा विकल्प परमार्थो भोगः संस-
रणसतत्व उपपद्यते ।
१-३. तन्त्रालोक—विवेक । ४-५. नेत्रतन्त्र ।