स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संवित् से देखने पर वही सम्यक् रूप से स्पष्ट, असंदिग्ध एवं अपने निश्चित रूप में
दृष्टिगत होने लगती है क्योंकि स्वरूप में कोई आवरण नहीं रहता।
आत्मबल के संस्पर्श से पुरुष सामने वाले पदार्थ के सदृश ही हो जाता है। अतः
यथार्थ ज्ञान होता है। इसी से मिलता जुलता अद्वैत वेदान्तियों का अन्तःकरणावच्छिन्न
प्रमाता का विषयावच्छिन्न चैतन्य से एक होने पर यथार्थ ज्ञान होता है और उसमें बल का
स्पर्श नहीं है।
'तत्त्वयुक्ति' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—जो विषयाधिपति है, वह जिसके
द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है उसको तत्त्वतः अर्थात् आत्मसंवित् के रूप में जान लेने पर
चराचर का ज्ञान हो जाता है—
(१) अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥१
(२) विषयाधिपतियों हि येन जानाति पार्वति ।
तस्य यो वेत्ति तत्त्वेन तेन ज्ञातं चराचरम् ॥२
यथा हि = जिस प्रकार निश्चय ही। कोई ॥
सावधाने = पूर्ण अवधान रखने पर। तदर्थ—दिदृक्षा हेतु निविड प्रयत्न करने के
बाद भी। चेतसि = चित्त के।
अस्फुट = अस्पष्ट ॥ भाति = (प्रथते) = दृष्टिगत होता है, प्रतीत होता है।
भूयो = फिर (इसके अनन्तर) ॥ स्वबलोद्योगभावितः = अपनी सामर्थ्य एवं
पुरुषार्थ से युक्त। अपनी सर्वज्ञ आत्मा का बल या सामर्थ्य। शक्ति = तत्त्व आदि
लक्षणा वाली शक्ति ॥ उस शक्ति के द्वारा उद्योग = उद्यमो ॥ उद्योग = निविड-
तरावधान से दर्शनोत्साहित।
भावित = लक्षित ॥ स्फुटतरो भाति = प्रत्यभिज्ञायमान निरवशेष विशेष।
सोऽयम्—यह तथ्य स्पष्टता से परिज्ञात हो जाता है।
भावार्थ—जिस किसी भी व्यक्ति को अपना दर्शनीय अभीष्ट तत्काल स्पष्टतः नहीं
दृष्टिगत होता, विस्फारित नेत्र होकर देखने पर भी सम्यक् रूप से दृष्टिगत नहीं हो पाता
किन्तु क्षणान्तर में ही उसी स्थान में स्थित वही पदार्थ उसको सूक्ष्मतापूर्वक अनन्य
दृष्टिपूर्वक 'न्यक्षनिक्षिप्ताक्ष' होकर देखने पर स्पष्टतः दृष्टिगोचर होने लगता है—इसका
कारण क्या है?
इसका कारण यह है कि यद्यपि यह सत्य है कि बाद में भी उसे देखने के लिए
द्रष्टव्य से अतिरिक्त किसी अन्य साधन का आहरण एवं उपयोग नहीं किया जाता किन्तु,
प्रत्युत् होता यह है कि—साधक के अंतर में तात्विक स्वभावानुप्रेवेश का आविर्भाव हो
जाता है जिसके बल के स्पर्श से उस दिदृक्षु व्यक्ति को वह पदार्थ याथात्म्यरूप से
प्रकाशित हो उठता है—अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि—स्वबलोद्योग मात्र ही सभी
१. स्पन्दनिर्णय—आचार्य क्षेमराज । २. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।