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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 519 में से

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पृष्ठ 340

प्रथमः निष्यन्दः २३९
'आत्मनो भैरवं रूपं भावयेद्यस्तु पूरुषः ।
तस्य मन्त्राः प्रसिध्यन्ति नित्ययुक्तस्य सुन्दरि ॥'
यही है बन्धन के प्रशमोपाय, उपेय विश्रान्ति—इसे ही कहा गया है—'उद्यमो
भैरवः ॥' (१।५)
स्पन्द का स्वरूप-लक्षण—
अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन्वा यत् पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥
अत्यन्त क्रोधाविष्ट होने पर, आनन्द के चरम सोपान पर आरूढ़ होने पर, 'मैं
क्या करूँ?' इस प्रकार की (किंकर्तव्यविमूढ़ता) अवस्था में पड़ने पर, (दौड़ने के लिए
विवश होने पर अकस्मात्) दौड़ पड़ने पर—(कोई भी व्यक्ति) जिस अवस्था में प्रवेश
करता है वही 'स्पन्द' तत्त्व उदित हो जाता है ॥ २२ ॥

  • सरोजिनी *
    'स्पन्द' के दो रूप हैं—(१) सामान्य स्पन्द (२) विशेष स्पंद ।
    'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात्' (१९)
    गुणादिस्पन्द—ये 'विशेष स्पन्द' कहलाते हैं और 'सामान्य स्पन्द' के आश्रित हैं।
    स्पन्दतत्त्व तो जाग्रत आदि भेदात्मक अवस्थाओं में भी व्याप्त रहता है—
    'जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति ॥' (३)
    'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्व विविक्तये ।
    जाग्रदेव निजं भावं न चिरेणाधिगच्छति ॥ (२१)
    अकस्मात् क्रोधावेश की चरमसीमा पर पहुंचने, विवशतावश अकस्मात् दौड़
    पड़ने, किंकर्तव्यविमूढ़ होने पर, व्यक्ति के भीतर शक्ति प्रत्यस्तमित दशा का प्राकट्य
    होता है और इन अवसरों पर स्पन्दतत्त्व जाग्रत् अवस्था में भी उदित हो उठता है—
    'तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे, प्रहृष्टे, धावमाने च 'किं करोमि' इत्येवं चिन्ताविष्टे यदा
    शक्ति प्रत्यस्तमयः तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरूपदेशात् अधिगन्तव्यः ॥'
    (भट्टकल्लटः वृत्ति) ।
    जहाँ जब एवं जिस अवस्था में समस्त शक्तियों का लय हो जाता है और मन
    केवल अनन्य रूप से एक चित्त वृत्ति परायण हो जाता है उस अवस्था में आत्मस्वस्वरूप
    'स्पंद' स्पष्टतया स्थित रहता है यथा क्रोधावेश में, भयावेश में, प्रेमावेश में, हर्षावेश
    में । इसी भाव को सुस्पष्ट करता हुआ ग्रन्थकार कहता है—
    अत्यधिक क्रुद्ध या उत्तेजित है या अत्यधिक आह्लादित है या वह जो—'मैं क्या
    करूँ?'—इस प्रकार सोच रहा हो, या (इधर-उधर) दौड़ रहा हो—वह जिस पद
    (अवस्था) में जाता है (जिस भावभूमि पर आरूढ़ होता है) वहाँ 'स्पंदतत्त्व' प्रतिष्ठित
    रहता है ॥ २२ ॥