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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 519 में से

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पृष्ठ 315

२१४ स्पन्दकारिका
३) प्रबुद्ध प्रमाता—शिवानुग्रह, शक्तिपात आदि कारणों से बुद्ध प्रमाताओं में से
कतिपय प्रमाताओं के हृदय में सांसारिक विषयों से वैराग्य उत्पन्न हो जाता है और ये
प्रमाता सतर्क, भक्ति एवं सद्ज्ञान का आश्रय लेकर और जागत एवं जागतिक संबन्धों
को इन्द्रजाल मानकर आत्मशोध की ओर अग्रपद होते हुए अपनी तीव्रतम आत्मोत्कण्ठा
की भूमिका पर आरूढ़ होने पर (शाङ्कर मार्ग में दीक्षित होकर) प्रबुद्ध भाव को अतिक्रान्त
करके सुप्रबुद्धभूमि पर पदार्पण करते हैं।
४) सुप्रबुद्ध प्रमाता—प्रबुद्ध प्रमाता अपनी एकनिष्ठ भक्ति, सद्ज्ञान एवं
परमात्मानुग्रह से अनुगृहीत होकर साधना-पथ पर अग्रपद होता हुआ शङ्कर रूप गुरु से
दीक्षा प्राप्त करके योगमार्ग के उच्च शृंगों पर पदार्पण करते हुए तुर्यात्मक शाक्त भूमिका पर
आरूढ़ होकर स्वस्वभाव का साक्षात्कार करके शिवत्व प्राप्त कर लेता है। यह प्रमाता
'वर्ण', 'पद', 'मन्त्र', 'कला', 'तत्त्व', 'भुवन' नामक ६ मार्गों को अतिक्रान्त करके त्रि-
कालाबाधित, समरस्त, प्रशान्त, चिद्रूप एवं स्वस्वभावात्मक शिवभाव अधिगत कर लेता
है। वह 'चक्रेश्वरत्व' प्राप्त कर लेता है—स्वयं शिव हो जाता है और 'शिवोऽहं शिवोऽहं
शिवोऽहं शिवोऽहं' के रसानुभूति-रत्नाकर में लय हो जाता है। यही है उसकी
नित्योदित समाधि या जीवन्मुक्ति की अवस्था जिसमें 'पूर्णांहन्ता' का स्वानुभव योगी
को नित्य समरस शिवशक्ति के सामरस्य में आपादमस्तक निमज्जित करके उसे शिव बना
देता है। यही है आत्म प्रत्यभिज्ञा—स्वरूपावस्थान की अद्वैतात्मक उच्चतम अवस्था।
विभिन्न अवस्थाओं में आत्माभिव्यक्ति के विभिन्न रूप—
ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥ १८ ॥
पराशक्ति से समवेत एवं सर्वव्यापक आत्म चैतन्य जाग्रत अवस्था में मात्र 'ज्ञेय'
पदार्थों के रूप में एवं स्वप्नावस्था में मात्र ज्ञान स्वरूप होकर प्रकाशित होता है किन्तु वह
अन्यत्र (सुषुप्ति एवं तुरीय अवस्थाओं में) चिन्मात्र रूप में ही प्रकाशित होता है ॥ १८ ॥

  • सरोजिनी *
    आत्म चैतन्य (स्पन्दतत्त्व) किस अवस्था में कौन सा स्वरूप धारण करके
    प्रकाशित हुआ करता है—इसी विषय का इस कारिका में विवेचन किया गया है।
    'पद' = अवस्थायें।
    अवस्थायें
    जाग्रत अवस्था | स्वप्नावस्था | सुषुप्ति अवस्था | तुरीयावस्था | तुरीयातीत अवस्था
    (सामान्य स्पन्दभूमि) | (पूर्णचिन्मयावस्था)
    मुख्य मिश्रित | मुख्य मिश्रित | मुख्य मिश्रित