स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १८७
‘शून्य’ ही परमतत्त्व है । नागार्जुन प्रभृति दार्शनिकों ने ‘सर्वशून्यवाद’ की स्थापना की
ओर समस्त सत्ताओं का निषेध किया गया । अभिनवगुप्तपादाचार्य ने अपने ‘तन्त्रालोक’
नामक ग्रन्थ में इसे ‘सर्वापह्नवहेवाक धर्मा’ कहा । ये दार्शनिक सत्ता के प्रत्येक प्रमाता,
प्रमेय, प्रज्ञा आदि के अनस्तित्त्व को स्वीकार करते हैं । समस्त विश्व शून्य का विवर्त
होता है ।
१) मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत् ॥
२) न सत् नासन् न सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम् ।
चतुष्कोटि विनिर्मुक्तत्वं माध्यमिको गुरुः ॥
‘शून्य’ न सत् है, न असत् है, न सदसत् है, प्रत्युत् यह चतुष्कोटिविनिर्मुक्त तत्त्व
है: ‘चतुष्कोटि विनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ।’¹
१) शून्यवाद के अनुसार विश्व शून्य का विवर्त है । शून्य ही पारमार्थिक
सत्य है ।
२) विज्ञानवाद के अनुसार विश्व विज्ञान का विवर्त है ।
३) शान्त ब्रह्मवाद के अनुसार विश्व ब्रह्म का विवर्त है ।
४) व्याकरण-दर्शन के अनुसार विश्व शब्द का विवर्त है ।
‘विवर्ततेऽर्थभावेन जगत्प्रक्रिया यथा ॥’
५) आभासवाद के अनुसार विश्व केवल आभास है ।
६) प्रतिबिम्बवाद के अनुसार विश्व केवल सत्य का प्रतिबिम्ब है ।
७) स्वातन्त्र्यवाद के अनुसार विश्व स्पन्द की सिसृक्षा—इच्छा है ।
‘इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिः’ (माण्डूक्यकारिका)
‘मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत्’ (शून्यवाद)
८) भास्कराचार्य ने जगत् को ‘अविकृतपरिणाम’ कहा ।
९) रामानुजाचार्य ने जगत् को ‘परिणाम’ कहा ।
१०) गौड़पादाचार्य (अजातिवाद) यदि जगत् हो तब उसके स्वरूप के विषय में
कहा जाय कि वह सत् है कि असत्, विवर्त है कि परिणाम, आभास है कि प्रतिबिम्ब ।
यथार्थ तो यह है कि जगत् है ही नहीं ।
११) शङ्कराचार्य = जगत् न सत् है न असत् न सत्य है न मिथ्या है प्रत्युत् यह
है ‘अनिर्वचनीय’ ‘अनिर्वचनीयतावाद’ ॥
बौद्धों का शून्यवाद भी यही मानता है कि जगत, सत, असत्, सदसत् एवं सद-
सत से भिन्न-इन समस्त कोटियों से परे है—
‘न सत् नासन् सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम् ।
चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥’
१. माध्यमिककारिका ।