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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 519 में से

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पृष्ठ 282

प्रथमः निष्यन्दः १८१
अभाव (Non-existence) की सत्ता की कल्पना ही नहीं की जा सकती यहाँ
तक कि मूढ़ता (जड़ता) का भी वहाँ अस्तित्व नहीं है क्योंकि अभियोग के कारण 'वह
था' का निश्चय होता है । अतः वह अकृत्रिम (सहज) है । ज्ञान एक गंभीर सुषुप्ति के
समान है । वह सत्य स्मर्यमाण होने की दशा कभी प्राप्त नहीं कर पाता ॥१
'असदेवमदमग्र आसीत्' (छा०३।१९।१) भी कहा गया है किन्तु यहाँ उसका अर्थ
दूसरा है । वेदान्तियों ने जिस अभाव (Non-existence) की बात का उल्लेख किया है
उसकी कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि—'असदेवदमग्र आसीत्' (सृष्टि के प्रारंभ में
सब कुछ असत् था) सत् की धारणा तो विद्यमान वस्तुओं के कारण है और अभाव तो
यथार्थतः कुछ है ही नहीं । यदि सत्ता की धारण का इसके साथ संबन्ध स्थापित किया जाय
तो इसकी भी कुछ सत्ता दृष्टिगत होती है और तब यह अभाव स्वयं ही नष्ट हो जाएगा ।
इसके अतिरिक्त यह भी कि उस सार्वभौम विध्वंस की कल्पना ही कैसे की जा सकती है
जहाँ कि स्वयं यह धारणा रखने वाला या विचार करने वाला ही लुप्त हो जाता है? यदि
आप विचारक के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं तब तो सार्वभौम महाध्वंस ही असंभाव्य है
क्योंकि उस स्थिति में तो विचारक की सत्ता बनी रहेगी—वह विश्व में स्थित ही माना
जाएगा । अतः सार्वभौम महाध्वंस सत् का निर्माण नहीं कर सकता ॥
आक्षेपक का आक्षेप और उसके तर्क—यह विचारक कृत्रिम है और वह अभाव
से अभिन्न है । वह अपनी कल्पना के द्वारा विश्व के ध्वंस (विनाश) की धारणा व्यक्त
करता है और इस धारणा की परिपक्वता के समय वह अभाव के साथ नहीं भाव के
साथ अभिन्न हो जाता है । विश्व के रूप में नहीं प्रत्युत शून्य के रूप में अवस्थित ज्ञाता
इसलिए अस्तित्व में है क्योंकि वह ऐसा आत्मानुभव से अनुभव करता है और अपने को
ज्ञाता समझता है और संकुचित (सीमित) व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है । अतः
यहाँ असंगतता नहीं है ।२
अतः शून्यता (Vacuum) की दशा कृत्रिम है और यह अस्तित्व में इस रूप में
है कि यह कभी अस्तित्व में नहीं था । परमात्मा 'शून्य' के विषय में उपदेश तो देता है
जिससे कि वह वास्तविक ज्ञान को अनधिकारियों से मुक्त रख सके । ज्ञेय गंभीर सुषुप्ति
के समान हैं ।
जड़ता के रूप में विद्यमान स्वप्नहीन सुषुप्ति को सभी समझ सकते हैं । अतः
ध्यान करके अन्य 'शून्य' को प्राप्त करने की आवश्यकता ही क्या है? क्योंकि अयथा-
र्थता (सत्यहीनता) की दृष्टि से तो दोनों समतुल्य या अभिन्न हैं ।३
बहुत से दार्शनिक यथा वेदान्ती, नैयायिक, सांख्य एवं सौगत आदि जड़ता के
समुद्र में अधःपतित हो चुके हैं । मोह, अज्ञान या जड़त्व अभिन्न है । यही शून्य भी है ।
स्पंद तत्त्व में प्रवेशार्थियों के लिये शून्य एक व्यवधान है । ग्रन्थकार ने शून्यवाद का पूर्ण
उन्मूलन करने का प्रयास किया है । वेदान्तियों एवं सौगतों का खण्डन इस लिए किया
गया है क्योंकि इन दोनों की दृष्टि समान है ।४
१-४. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय ।