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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 519 में से

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पृष्ठ 279

१७८ स्पन्दकारिका
‘शिवसूत्रवार्तिक’ (वरदराज) में कहा गया है—
यथा सातिशयानन्दे कस्यचिद्विस्मयो भवेत् ॥ ६३ ॥
तथास्य योगिनो नित्यं तत्तद्ध्येयावलोकने ।
निःसामान्यपरानन्दानुभूतिस्तिमितेन्द्रिये ॥ ६४ ॥
परे स्वात्मन्यतृप्त्यैव यदाश्चर्यं स विस्मयः ।
स एव खलु योगस्य परतत्त्वैक्यरूपिणः ॥ ६५ ॥
भूमिकास्तत्क्रमारोह परविश्रान्तिसूचिकाः ॥१
श्री कुलयुक्ति में कहा गया है—
विस्मय क्या है?—
‘आत्मा चैवात्मना ज्ञातो यदा भवति साधकैः ।
तदा विस्मयमात्मा वै आत्मन्येव पश्यति ॥’२
शिवसूत्रविमर्शिनी में कहा है कि—
‘यथा सातिशयवस्तुदर्शने कस्यचित् विस्मयो भवति तथा अस्य महा योगिनो नित्यं
तत्तद्ध्येयावभासामर्शाभोगेषु निःसामान्यातिशय नव नव चमत्कार चिद्धन स्वात्मा वेशवशात्
स्मेर स्मेर स्तिमित विकसित समस्त करणचक्रस्य यो विस्मयोऽनवच्छिन्नान्दे स्वात्मनि
अपरितृप्तत्वेन मुहुर्मुहुराश्चर्यमाणता, सा एव योगस्य परतत्त्वैक्यस्य संबन्धिन्यो
भूमिका ॥’३
शैव दर्शन में ‘विस्मय’ एक पारिभाषिक शब्द है अतः अपना विशिष्ट अर्थ रखता
है । यह साधना की अनिर्वाच्य एवं स्वसंवेद्य आश्चर्यकारी भूमिका है । यह अणिमादिक
योग भूमियों से (जो कि परसंवेद्य हैं) उच्चतर है और आत्मानुभव की विस्मयोत्पादिका
भूमिका है ।
योगी शाक्त भूमिका की अनुभूतियों के अनन्तर उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर भूमिकाओं पर
आरूढ़ होने के लिए जिस निरतिशय कौतूहल से आविष्ट होकर परिणामतः विचित्र
अन्योन्यानुभूतियों के स्तर पर पहुँचता है वह यौगिक स्तर आश्चर्यों से भरा हुआ है । यह
स्वानुभवगम्य, अन्तर्मुखी, विस्मयकारी योग भूमिका योग की तुरीय भूमिका है ।
आचार्य वरदराज कहते हैं कि—जब व्यक्ति सांसारिक जीवन में किसी सातिशय
वस्तु को देखता है तो उसके मन में एक स्तंभकारिणी, साश्चर्य मनोवृत्ति का आविर्भाव
होता है । वह उन प्रत्यक्षीकृत विशिष्ट वस्तुओं के विशिष्ट आकार-प्रकार को विस्मयपूर्वक
देखता हुआ उनका स्वानुभव तो करता है किन्तु उसके आश्चर्यकारी सौन्दर्य की
अभिव्यक्ति न कर पाने पर भी वह उसके अकथ्य सौन्दर्यातिशय की अनुभूति में विलीन
हो जाता है—यही अवस्था ‘विस्मय’ है ।४ आध्यात्मिक धरातल पर जब कोई आत्मनिष्ठ
योगी वेद्य पञ्चक (पंच महाविषय) को सामान्यस्पन्दान्विता अहन्ता में लीन करके
१. शिवसूत्रवार्तिक (वरदराज) । २. कुलयुक्ति ।
३. शिवसूत्रविमर्शिनी (क्षेमराज) । ४. शिवसूत्रवार्तिक (वरदराज) ।