स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १७५
तत्त्वे निश्चलचित्तस्तु भुंजानो विषयानपि ।
नैव संस्पृश्यते दोषैः पद्मपत्रमिवांभसा ॥
विषा पहारिमन्त्रादिसन्नद्धो भक्षयन्नपि ।
विषं न मुह्यते तेन तद्वद्योगी महामतिः ॥ (भा०वि०)१
जो शुद्ध आत्म स्वभाव को अर्थात् अधिष्ठातृभाव से अपने को स्वयं प्रकाश
चिद्रूप से सर्वव्यापक रूप से देखता है वह मुस्कराता हुआ, विस्मयाविष्ट सा, खिलते हुए
फूल सा रहता है । अविद्या का विलय हो जाने के कारण उसके लिए यह क्षुब्ध संसार
कहाँ है? यह योगी की एक उच्च भूमिका है । इसकी दृष्टि द्रष्टा रूप से सभी का अनुभव
है ।
इष्टोपदेश नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—‘वत्स! तुम्हारी दृष्टि से यह जो कुछ
दृष्टिगत हो रहा है, उसका आग्रह छोड़ दो । जिससे देखते हो, उसको देखो । उसको
देख लेने पर सब कुछ देख लोगे ।।'
यदिदं दृश्यते दृष्ट्या ग्रहं पुत्राऽत्र सन्त्यज ।
येन पश्यति तं पश्य यं दृष्ट्वा पश्यसेऽखिलम् ॥२
ऐसी स्थिति में विकल्प की कारीगरी के अधीन होकर कुमार्ग में चलना नहीं होता,
सदा अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती हे । वही सत्यसंकल्प ईश्वर है । अभ्यास और
भावना से समस्त दुःख मिट जाते हैं । रसायन आस्वादन के बिना केवल ज्ञानमात्र से भी
सिद्धि देता है । कहा भी गया है—
‘यो जगु पश्वि एषु किंनु वीक्षोमाइत्य करो ।
विषयालविलुच्छि एसे पत्तापत्त रावीक्षोअपलइयद अस्त्युबुद्धि ।।'
‘वैसे तो प्रभो! आपको चरवाहे, बच्चे और स्त्रियाँ भी जानती हैं किन्तु साधन या
युक्ति के न होने से आप उन्हें मुक्त नहीं करते । गाय में स्थित दूध भूख प्यास नहीं
मिटाता । पान करने पर ही वह दूध भूख-प्यास मिटाता है ।'
मुनि ने भी कहा है— ‘यदि वाचनिकाज्ज्ञानान्मुक्तिः स्याद् भवनां विना ।
‘शारीरमानसैर्दुःखैर्मुच्येरन् सर्वजन्तवः ॥’
‘रसायनं विनास्वादात् सूचितं ह्यपि सिद्धिदम्'३
भले ही रसायन का आस्वादन न किया जाय और मात्र उसके गुणों को सूचित ही
किया जाय फिर भी सिद्धि प्रदान करता है ।
दूसरे स्थल पर भी कहा गया है कि—
आगोपालबालवनितं भगवंस्त्वमित्थं,
ज्ञातोऽप्युपायविरहान्न तु मोक्षदोऽसि ।
नान्तः स्थितं भवति धनेषु तृड्विहर्तृ,
क्षीरं तदेव पुनरभ्यवहारतः स्यात् ॥४
१-४. उत्पलदेवाचार्यः ‘स्पन्दप्रदीपिका' ।