स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १६१
उपादान जीव (चैतन्य) (चैतन्य के स्थान)
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विवर्त परिणाम आरंभ नेत्र में कण्ठ में हृदय में ब्रह्म में
(जाग्रति) (स्वप्न) (सुषुप्ति) (तुरीय)
'जीव' = अन्तःकरण का साहित्य ॥
'ईश्वर' = अन्तःकरण का साहित्य ॥
परमपद
परम पद का स्वरूप क्या है?—'स्यात् परमं पदम्'—
१) यजुर्वेद—तत्त्वद्रष्टा ऋषिमूनि विष्णु के परम पद का सर्वदा साक्षात्कार करते
हैं—ओ३म् तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥'
२) परमाकाश परम व्योम का ही अभिधानान्तर 'परमपद' है ।
३) मन्त्रलयोपरान्त सुषुम्ना में नादात्मक प्रणवानुभूति या अनवरत नादश्रवण से
उत्पन्न होने वाला विराट् या परमाकाश ही 'परमपद' है ।
४) निरालम्बोपनिषद् में कहा गया है कि—'प्राण' इन्द्रिय आदि एवं अन्तः-
करण के गुणादिक के परे सच्चिदानन्दन्य नित्य, मुक्त परब्रह्म ध्यान ही 'परमपद' है—
'परमंपदमिति च प्राणेन्द्रियाद्यन्तः करणगुणादेः परतरे सच्चिदानन्दमयं नित्यमुक्तब्रह्मस्थानं
परमं पदम् ॥
५) ध्यानबिन्दूपनिषद् के मतानुसार—'शब्द के साथ अक्षर नाद के क्षोभ होने पर
उत्पन्न शब्द शून्यावस्था की स्थिति ही 'परमपद' है—
'बीजाक्षरं परं बिन्दुं नादं तस्योपरि स्थितम् ।
सशब्दं चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम् ॥'
६) मैत्रायणी उपनिषद् के अनुसार 'लय विक्षेप-शून्य मन को सम्यक् रूप से
स्थिर करके जो अमनी भाव का उदय होता है वही 'परमपद' है—लय विक्षेपरहितं मनः
कृत्वा सुनिश्चितम् ।
यदा यात्यमनीभावं तदा तत्परमं पदम् ॥ (मैत्रायणी उप० ६-३४)
७) तेजोबिन्दूपनिषद् में कहा गया है कि परम गोपनीय अस्तन्द्र निराश्रय सोमरूप
सूक्ष्मा कला ही विष्णु का 'परमपद' है—
परमं गुह्यतमं विद्धि ह्यस्तन्द्रो निराश्रयः ।
सोमरूपकला सूक्ष्मा विष्णोस्तत्परमं पदम् ॥ (१.५)
८) श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है कि—
क) निश्चल चित्त से एक-एक अवयव का ध्यान करना चाहिए ।
ख) मन को विषय-शून्य बनाकर विषय-शून्य मन का उससे योग करना चाहिए ।
स्पं० ११