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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 519 में से

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पृष्ठ 260

प्रथमः निष्यन्दः १५९
चिदात्मक एवं चिद्रूप है किन्तु बुद्धि इस अद्वैत एवं अभेद में भी द्वैत की कल्पना कर
लेती है और यह व्यतिरेकिणी बुद्धि ही अशुद्धि है और बुद्धि के इस भेदात्मक स्वरूप का
विमर्दन ही 'पराशुद्धि' है—
चिदात्मकेष्वप्येतेषु या बुद्धिर्व्यतिरेकिणी ।
सैवाशुद्धिः परा प्रोक्ता शुद्धिस्तद्धी विमर्दनम् ।। (परिमल)
शुद्धविद्या क्या है? अशुद्धविद्या कलङ्क प्रक्षालनाविनाभूता स्वस्वभावप्रत्यभिज्ञाप-
नात्मिका संवित्स्वातन्त्र्यशक्तिः शुद्धविद्या' । (परिमल)
'विज्ञानभैरव' में 'शुद्धि' एवं 'अशुद्धि' का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है—
किञ्चिज्ज्ञैर्या स्मृताऽशुद्धिः सा शुद्धिः शम्भुदर्शने ।
न शुचिर्ह्यशुचिस्तस्मान्निर्विकल्पो भवेन्नरः ।। (परिमल)
वेदान्त का मत—
१) 'मल' = अन्तःकरण के मलिन संस्कार ।
२) 'विक्षेप' = चित्त - चाञ्चल्य । —विल्का
३) 'आवरण' = स्वरूप - विस्मृति ।
शुद्धि-प्रक्रिया— १) 'मल' मल की शुद्धि—(मल-निवृत्ति) = निष्कामोपासना से
२) विक्षेप-निवृत्ति—शुद्ध एवं एकनिष्ठ = उपासनायोग से ।
३) आवरण-निवृत्ति— शुद्ध - ज्ञान से ।
'आवरण' का कार्य = स्वरूप-विस्मृति । 'विक्षेप' का कार्य = अध्यारोपा
अध्यास ।।
'अविद्या' का स्वरूप = त्वं परमात्मानं सन्तं संसारिणं संसार्यहमस्मीति विप-रीतं
प्रतिपद्यसे । अकर्तारं सन्तं कर्तेति, अभोक्तारं सन्तं भोक्तेति, विद्यमानं च अविद्यमान-मिति
इयमविद्या ।। (शङ्कराचार्य)
अविद्या नाम अन्यस्मिन् अन्य धर्माध्यारोपणा ।। (पञ्चदशी)
'माया' और 'अविद्या' में भेद— १. दोनों प्रकृतियाँ सत्व की शुद्धि—'माया'
२. सत्व की मलिनता— 'अविद्या' । (विद्यारण्य = 'पञ्चदशी') ।
'प्रकृति' के दो रूप—'माया' 'अविद्या' सत्व शुद्धयविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते
मते ।।
१) अचिन्त्य रचना शक्ति बीजं 'मायेति' निश्चिनु ।। (पञ्चदशी)
२) मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।।
अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् । ('पञ्चदशी')
३) चिदानन्दमयब्रह्म प्रतिबिम्बसमन्विता ।
तमोरजः सत्वगुणा प्रकृतिर्द्विधा च सा ।। (पञ्चदशी)