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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 519 में से

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पृष्ठ 254

प्रथमः निष्यन्दः १५३
क्षोभ—सांख्यदर्शन तो सतोगुण रजोगुण एवं तमोगुण के साम्य में भंग को ही
‘क्षोभ’ कहता है। काम क्रोध आदि से उत्पन्न समस्त आवेग क्षोभ हैं। विकल्प दशा में
ही क्षोभ उत्पन्न होता है। क्षोभ के शान्त होने पर निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप का साक्षात्कार
होता है।
प्रशास्तिभूतिपाद—विकल्प-व्यापार का शोधन आवश्यक है। संसार के समस्त
आकर्षक पदार्थ मन को आह्लादित करते हैं। उन सभी में अपना स्वात्मस्वरूप ही
प्रकाशित हो रहा है—वह सन मैं ही तो हूँ। सभी पदार्थों में इस प्रकार से स्वात्मस्वरूप
की भावना से मन का ‘क्षोभ’ शान्त होता है। ‘विज्ञानभैरव’ की ७५, ८६-८७, ९०-
९१, एवं १०३ संख्या की धारणाओं में बाह्य क्षोभ की शान्ति के उपायों का विवेचन
किया गया है—
विकल्प—जिन विकल्पों के संस्कार से सहज विद्या का उदय होता है और शुद्धि
प्राप्त होती है वे क्या हैं? बाह्य नील-पीत, घट-पट आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी
पदार्थ ‘विकल्प’ हैं।
‘महार्थमञ्जरी’ : महेश्वरानन्द—१
अशुद्धि और शुद्धि—यदि कोई अर्चक अर्चना, उपासना या साधना करता है तो
उसे सबसे पूर्व अपनी साधना-यात्रा के मार्ग के प्रतिबन्धकों को दूर करना पड़ेगा। यह
प्रतिबन्धक है—‘अशुद्धि’। इसका निवारण होता है—‘शुद्धि’ द्वारा।
‘शोषो मलस्य नाशो दाह एतस्य वासनोच्छेदः।
आप्लावनं तनूनां ज्ञानसुधासेकनिर्मिता शुद्धिः ॥’
‘सोसो मलस्स णासो दाहो एअस्स वासणुच्छेओ।
अब्बालणं तूणूणं णाण सुहासेऽअणिम्मिआ सुद्धी ॥’२
अशुद्धि को दूर करने के उपाय—
१) मल के नाश का उपाय = ‘शोष’
२) वासनोच्छेद का उपाय = ‘दाह’
३) शुद्धि का उपाय = ‘आप्लावन’ ३
शुद्धि के उपाय—आप्लावन = ‘शरीरों की ज्ञान सुधासेवानिर्मिता शुद्धि’
अर्चकों में एक अलौकिकता का आविर्भाव होता है। यह मलोपलेपों के क्षय से
संपादित होता है। उसमें ‘शोष’ की भूमिका क्या है?४
‘शरीराणां शोषो नाम तदायतस्य मलस्य संसारांकुरकारणभूतस्याज्ञानस्य कर्शन-
मेवः ॥’ (संसारांकुर-कारण मल रूप अज्ञान का कर्शन ही ‘शोष’ है। ‘दाह’ की
**भूमिका क्या है?**५
‘दाहश्च नाम तेषां प्रस्तुतस्यैव मलस्य या वासना संस्कारसारतयावस्थानम् तद्व-
युदासस्वभावो भवति ॥’६
१-४. महार्थमञ्जरी। ५-६. परिमल।