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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

परिचय एवं पृष्ठभूमि २३
१. अभेदात्मक, २. भेदाभेदात्मक, ३. भेदात्मक निखिल शास्त्रों की अवतारणा । →
‘बैखरी वाक्’ । १
सोमानन्द (९००-९५० वि०) के शिष्य उत्पलाचार्य (९५०-१०००वि०) हैं ।
सोमानन्द → उत्पलदेवाचार्य (शिष्य) → (पुत्र एवं शिष्य) ।
(१) लक्ष्मणगुप्त → अभिनवगुप्त (१०००-१०५० वि०) → (शिष्य) राजानक
क्षेमराज → (शिष्य) योगराज । (सोमानन्द ‘शिवदृष्टि’) ।
(२) वसुगुप्त की द्वितीय शिष्य
परम्परा—(शिवसूत्रवार्तिक) ‘तन्त्रालोक’ (प्रथमाह्निक) श्लोक ८ में
(क) वसुगुप्त अभिनवगुप्त कहते हैं—
(१०वीं श०वि०) ‘त्रैयम्बकाभिहितसन्ततिताम्रपर्णी
↓ सन्मौक्तिकप्रकरकान्तिविशेषभाजः ।
(ख) कल्लट पूर्वे जयन्ति गुरवो गुरुशास्त्रसिन्धु
↓ कल्लोलकेलिकलनात्मककर्णधारः ॥
(ग) प्रद्युम्न भट्ट —श्रीतन्त्रालोक (प्र०अ० ८)
↓ श्रीमच्छ्रीकण्ठनाथाज्ञावशात्सिद्धा अवातरन् ।
(घ) प्रज्ञार्जुन त्र्यम्बकामर्दकाभिख्य श्रीनाथा अद्वये द्वये ।
↓ द्वयाद्वये च निपुणः क्रमेण शिवशासने ।
(ङ) महादेव भट्ट आद्यस्य चान्वयो जज्ञे द्वितीयो दुहितृक्रमात् ॥
↓ स चार्थत्र्यम्बकाभिख्यः सन्तान सुप्रतिष्ठितः ।
(च) श्रीकण्ठ भट्ट अतश्चार्धचतस्रोऽत्र मठिकाः सन्तति क्रमात् ॥
↓ (विवेकः जयरथ)
(छ) भास्कर
श्रीमान् श्रीकण्ठ की आज्ञा से ही—१. त्र्यम्बक २. आमर्दक ३. श्रीनाथ नामक
क्रमशः (१) अद्वयवाद (२) द्वैतवाद (३) द्वयाद्वयवाद के प्रवर्तक सिद्ध अवतरित हुए ।
इसमें त्र्यम्बक की वंशपरम्परा प्रवर्तित हुई । आमर्दक की पुत्री का वंशक्रम चला । वह
सन्तान अर्ध त्र्यम्बक रूप से प्रतिष्ठित हुई । इस प्रकार यह तीन की जगह ३ १/२ हो गई ।
इनकी परम्परायें चलीं । सन्तति क्रम से ये मठिकायें स्थापित हुई ॥’
१. श्री सन्तति २. आमर्दक ३. त्रैयम्बक ४. अर्द्ध त्रैयम्बिक—यह साढ़े तीन
मठिकायें हुई । इनमें से त्रैयम्बक मठिका से ही इस प्रस्तुत प्रक्रिया का प्रवर्तन हुआ ।
परम पाशुपताचार्य भगवान् श्रीकण्ठनाथ ने अद्वयवादी शैव शास्त्र का प्रवर्तन किया ।
१. इह खलु परपरामर्शसारबोधात्मिकायां परस्यां वाचि सर्वभावनिर्भरत्वात् सर्वशास्त्रं
परबोधात्मकतयैव उज्जृंभमाणं सत्, पश्यन्ती दशायां वाच्यवाचकाविभाग-
स्वभावत्वेन असाधारणतया अहम्प्रत्यवमर्शतात्मा अन्तरुदेति अतएव हि तत्र
प्रत्यवमर्शन प्रमात्रा परामृश्यमानो वाच्योऽर्थोऽहन्ताच्छादित एव स्फुरति ॥