स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ स्पन्दकारिका
सोमानन्द प्रोक्त आचार्य- (शैव शास्त्र की ३ १/२ शाखायें)
परम्परा— दुर्वासा (मा० योग बल द्वारा) $\rightarrow$ ३ पुत्र
$\downarrow$ ┌──────┬──────┐
श्रीकण्ठ द्वारा दुर्वासा को आदेश त्र्यम्बक आमर्दकनाथ श्रीनाथ
$\downarrow$
दुर्वासा (गुफा में त्र्यम्बक नामक (द्वैताद्वैत (द्वैत व शैव
$\downarrow$ मानस पुत्र को अद्वैतोपदेश सिद्धान्त का शास्त्र का
त्र्यम्बकादित्य (मानसपुत्र) देकर दुर्वासा अंतर्धान हो उपदेश) उपदेश)
$\downarrow$ गए)
१४ सिद्ध त्र्यम्बक नाथ $\rightarrow$ मानसपुत्री
(मानसपुत्रों की पीढ़ी) $\rightarrow$ 'अर्धत्र्यम्बक शाखा'
$\downarrow$ प्रवर्तन —तन्त्रालोक (३२ आ०)
संगमादित्य (बिन्दु क्रम) (१) १४ सिद्ध तो
$\downarrow$ अन्तर्मुखावस्था में स्थित ।
वर्षादित्य (२) १५ वाँ सिद्ध
$\downarrow$ बहिर्मुखावस्था में था। अतः
वरुणादित्य योगबल से मानसिक पुत्रों
$\downarrow$ को जन्म देने में असमर्थ था
आनन्द $\rightarrow$ ब्राह्मण कन्या से विवाह
$\downarrow$ $\rightarrow$ संगमादित्य $\rightarrow$
सोमानन्दपाद (काश्मीर में आकर निवास)
(त्र्यम्बक परम्परा में आविर्भूत) $\rightarrow$ वर्षादित्य $\rightarrow$
$\downarrow$ अरुणादित्य $\rightarrow$ आनन्द
उत्पलदेवाचार्य $\rightarrow$ सोमानन्द $\rightarrow$ (शिष्य)
$\downarrow$ उत्पलदेवाचार्य ।
रामकण्ठाचार्य
(१) काश्मीर का 'शिवाद्वयवाद' : समस्त मूलशास्त्र (सर्वप्रथम) =
विक्रम की नवम शताब्दी में प्रादुर्भूत 'परावाक्' ।
समग्र शास्त्र । (वाच्य-वाचक की अविभक्तावस्था)
प्रादुर्भाव के पूर्व परावाक् में स्थित $\rightarrow$ 'मध्यमा' = (संपूर्ण वाच्यवाचक
(अव्यक्तावस्थावस्थित था) । विश्व के रूप में स्थित) १
परावाक् $\rightarrow$ पश्यन्ती $\rightarrow$ मध्यमा $\rightarrow$ संपूर्णवाच्यवाचक प्रपञ्च का विभाजन $\rightarrow$
मध्यमावस्था में ही परमात्मा द्वारा अपनी ५ शक्तियों (चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान,
क्रिया) द्वारा $\rightarrow$ 'ईशान', 'तत्पुरुष' 'सद्योजात', 'अघोर' एवं 'वामदेव' ५ मुख $\rightarrow$
१. अभिनवगुप्तपाद के 'तन्त्रालोक' की टीका (आ० १। श्लोक १८)—परमेश्वर एव
चिदानन्देच्छा ज्ञानक्रियात्मक वक्त्र पञ्चकसूत्रणेन सदाशिवेश्वरदशामधिशयानः
तद्वक्त्रपञ्चकमेलनया पञ्चस्रोतोमयं अभेद-भेदाभेद-भेदशोदृकनेन तत्तद्भेदप्रभेद
वैचित्र्यात्मनिखिलं शास्त्रमवतारयति, यद् बहिर्वैखरीदशायां स्फुटतामियात् ॥