स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः ११९
किस प्रकार का 'इन्द्रिय समूह' ? विमूढ़ । जड़ । किस प्रकार प्राप्त करता है?
'अमूढ़वत्' = चेतनवत् ॥
तात्पर्य यह है कि— जिसके संस्पर्शबल से प्राकृत एवं जड़ बाह्याभ्यन्तर इन्द्रिय-
ग्राम प्रवृत्ति आदि चेतन व्यापार निष्पादित करने में समर्थ होते हों उस तत्त्व को
आत्मतत्त्व के रूप में स्फुटीकृत करे । वह इन्द्रियों में चैतन्य संपादित करने की स्वातन्त्र्य
शक्ति की भाँति समस्त विषयों को स्वातन्त्र्य प्राप्त कराने में समर्थ है । अतः उसकी
परीक्षा भी की जानी चाहिए ।१
उसकी परीक्षा की जानी चाहिए जिसके द्वारा, अभ्यासदशा में ही स्वातन्त्र्य के
अभिव्यज्यमान होने पर परशरीरावेशादि क्रीड़ा निष्पादित होती है । वह यह है कि—
'न च सुखादिरूपो यदा नासौ' एवं—'तस्मात्तत्त्वं यत्नेन परीक्षितव्यम्' ।२
यह वही स्वातन्त्र्य स्वरूपा शक्ति है जिसका बाह्यावभासन ही विश्व है, जो स्वात्म-
संवित्ति है, अद्वैत है, एक है और शिव का विमर्शात्मक हृदय एवं सारे अस्तित्वों का
'सार' है—
यस्यामन्तर्विश्वमेतद्विभाति, बाह्याभासं भासमानं विसृष्टौ ।
क्षोभे क्षीणेऽनुत्तरायां स्थितौ तां वन्दे देवीं स्वात्मसंवित्तिमेकाम् ॥३
इसे 'स्वातन्त्र्य शक्ति' इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें किसी भी क्रिया के संपाद-
नार्थ परापेक्षा नहीं है—यथा योगी—
योगिनामपि मृद्बीजे विनेवेच्छावशेन तत् ।
घटादि जायते तत्तत्स्थिरस्वार्थ क्रियाकरम् ॥४
जड़ादिक पदार्थों में यह शक्ति नहीं है यह कर्तृत्व एवं चैतन्य शक्ति भी उन्हें इसी
स्वातन्त्र्य शक्ति से प्राप्त होती है—
जडस्य तु न सा शक्तिः सत्ता यदसतः सतः ।
कर्तृकर्मत्वतत्वैव कार्यकारणता ततः ॥५
स्वातन्त्र्य की अन्य विलक्षणतायें निम्न हैं—
१. आत्मानमत एवायं ज्ञेयीकुर्यात्पृथक् स्थितिः ।
ज्ञेयं न तु तदोन्मुख्यात् खण्डयेतास्य स्वतन्त्रता ॥ ४६ ॥
२. स्वातन्त्र्यामुक्तमात्मानं स्वातन्त्र्यादद्वयात्मनः ।
प्रभुरीशादिसंकल्पैर्निर्माय व्यवहारयेत् ॥ ४७ ॥
३. चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः ।
योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ ४.३८ ॥६
(यह इच्छा ही 'स्वातन्त्र्यशक्ति' है ।)
१-२. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति । ३. परात्रिंशिकाविवृति ।
४-६. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका ।