स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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यहाँ पर सुखादिरूपता का प्रतिषेध होने के कारण इसके वेद्यत्व का भी प्रतिषेध
किया गया है।
वेद्य के अनेक प्रकार है यथा १. बाह्य वेद्य २. आन्तर वेद्य ।। आभ्यन्तर वेद्य =
अन्तःकरण द्वारा वेद्य होने के कारण आभ्यन्तर वेद्य कहलाते हैं । 'बाह्य वेद्य' =
शब्दादिक पदार्थ 'वेद्य' पदार्थों को ही 'ग्राह्य' भी कहते हैं। ये श्रोत्र आदि बाह्य इन्द्रियों
द्वारा गृहीत होते हैं और अन्तःकरण के द्वारा सुखादिक के रूप में अनुभूति के विषय
बनते हैं। 'वेद्यते इति वेद्यः' ।।
ग्राहक या वेदक भी मायीय प्रमाता है न कि तात्त्विक । बहु उपलब्धृमात्रस्वरूप है
किन्तु वह तत्त्वतः नित्य है। इस प्रकार जहाँ पर देहादिक में अहंकार रखने वाला ग्राहक
भी नहीं है ।१
कहीं-कहीं 'ग्राह कम्' पाठ भी है। 'ग्राहक' = इन्द्रियाँ (जहाँ इन्द्रियाँ भी नहीं
है।) इस प्रकार जिस परम पद में—ग्राह्य-ग्राहक स्वरूप से व्यतिरिक्त ग्रहीतृमात्रस्वभाव
पर तत्त्व है वही परमार्थ है ।२
'न च मूढभावोऽपि' = जहाँ मूढ़भाव भी नहीं है । अर्थात् यदि यह कहा जाय
कि यदि सुख-दुःख, ग्राह्य-ग्राहक आदि कोई सत्ता उस पद में नहीं है तो मूढावस्था तो
होगी ही?—इसी के निराकरणार्थ ग्रन्थकार कहता है कि वहाँ मूढ़ावस्था भी विद्यमान
नहीं है ।३
मूढ़भाव = 'मूढस्य भावो मूढत्वं' अर्थात् वेद्यवेदनसामर्थ्याभाव । मूढ़भाव भी
इसलिए विद्यमान नहीं है क्योंकि यदि वहाँ मूढ़भाव विद्यमान होता तो व्यक्ति को अनुभव
में आता कि 'मैं मूढ़ था'—और ऐसा प्रत्यवमर्श होने पर वेद्यता की सत्ता तो बनी ही
नहीं रहती जो कि परमार्थ पद में है ही नहीं। यदि वेद्यता बनी रहती तो मूढ़ावस्था
का किस प्रकार वेदकैकस्वभाववस्तुरूपत्व हो पाता ? यदि वहाँ पर मूढ़ भाव की भी
सत्ता विद्यमान नहीं रहती है तब तो उसकी प्रतिपत्ति के गोचरीभूत समस्त वेद्यवस्तुरूपता
के प्रतिषेध के कारण वहाँ अभाव की सत्ता विद्यमान मानी ही जानी चाहिए—इसी
पूर्वपक्ष के प्रतिक्षेपार्थ ग्रन्थकार ने कहा कि—'तदस्ति परमार्थतः ।'४
वह सद्रस्तु ('तत्') परमार्थतः (तत्त्वतः) सत्ताशील है । क्योंकि वह नित्यरूप से
अविलुप्त है और उपब्धृमात्रलक्षणस्वभाव है।
चूँकि कल्पनामात्रलब्धात्मक सुखादिक पदार्थ क्षणभंगुर वेद्य पदार्थ हैं अतः वेदक
मात्र स्वभाव वाले आत्मा से ये वेद्य पदार्थ भिन्न होते हुए भी उनकी ही कल्पना होने के
कारण उनसे भिन्न भी नहीं है—जो जो वेद्य भूमिका में हैं वे सभी अनित्य होने के कारण
असत् है—'यत् यत् वेद्यभूमिकायां वर्तते तत् सर्वं असत् अनित्यत्वात्' ।५
पारमार्थिक सत्ता क्या है?—कारिकाकार ने परमार्थ सत् को दुःख, सुख,
ग्राह्यता । ग्राहकता, मूढ़भाव इत्यादि सभी से परे माना है—
१-४. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका । ५. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति।