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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 519 में से

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पृष्ठ 196

प्रथमः निष्यन्दः ९५
गीता में भी कहा गया है—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च'
'इत्यलं कुतर्काश्मनां चर्वणेन' (कुतर्कों के पत्थर चबाना बन्द करो।)।१
संवेत्ता का स्वरूप क्या है? 'किंभूते संवेत्तरि'? किस प्रकार के संवेत्ता में? यह
वह संवेत्ता है जिसमें सुख-दुःख, मोह—प्रबोध आदि समस्त अवस्थायें स्थित हैं । ये
अवस्थायें उसमें सूत में मणियों की भाँति अनुस्यूत हैं ।
'मैं पहले सुखी था, आज मैं दुःखी हूँ',-इस अनुभव में सुख एवं दुःख में
भेद तो है किन्तु 'मैं-मैं' में भेद नहीं है । इस स्मृति एवं प्रत्यभिज्ञा का उसीको अनु-
सन्धान हुआ करता है । इन अवस्थाओं में भी वह नहीं है क्योंकि ये अवस्थायें विकल्पमात्र
हैं एवं अनित्य हैं । संवेत्ता इनसे अतिरिक्त है । अविद्यावरण तो केवल उपरागमात्र है यथा
चन्द्रमा सूर्य पर ग्रहण । अंधकार से आच्छन्न होने पर रस्सी साँप नहीं बन जाती और न तो
नष्ट होती है । इसी प्रकार आत्मा का कुछ बिगाड़ नहीं सकती—भर्तृहरि कहते हैं—२
नाच्छादितस्य तमसा रज्जुखण्डस्य विक्रिया ।
नाशो वा क्रियते यद्वत्तद्वन्नाविद्ययाऽऽत्मनः ॥
'संवित्प्रकाश' में भी कहा गया है कि स्फटिक का स्वभाव अत्यन्त निर्मल है
किन्तु जपाकुसुम आदि का उपराग होने पर स्फटिक लाल दिखाई पड़ने लगता है ।
भगवान् संवेत्ता का अत्यन्त निर्मल शरीर भावसमासक्त होकर विविध प्रकार का उपलब्ध
होता है । यथा स्फटिक रंगीन नहीं होता वैसे ही भाव युक्त होने पर संवित् वैसी ही नहीं
हो जाता । यह आत्म संवित् भी उपरक्त होने पर भी अपने निजरूप का परित्याग
नहीं किया करता । रूपान्तरित न होने पर भी रूपान्तरित के तुल्य दृष्टिगोचर अवश्य
होता है । जो कुछ भी दिखाई पड़ता है सब कुछ उसीका तो विलास है—३
अत्यन्ताच्छस्वभावत्वात् स्फटिकस्य यथा स्वकम् ।
रूपं परोपरक्तस्य नित्यमेवोपलभ्यते ॥
तथा भावसमासक्तं भगवंस्तावकं वपुः ।
अत्यन्तनिर्मलतया पृथक् तैनोपलभ्यते ।
नैतावताऽसौ स्फटिकः पृथङ्नास्त्येव रञ्जकात् ।
भावरूपपरित्यक्ता तव वा निर्मला तनुः ॥४
उपराग की स्थिति में भी शुद्धत्व नष्ट नहीं होता—
उपरागेऽपि शुद्धत्वं न त्यक्तमनया प्रभो ।
परित्यज्य निजं रूपं संविदाख्या कुतश्च यत् ।
अथाऽप्राप्त्यैव तद्रूपं भवेद्रूपान्तरानुगा ।
तद्रूपापि हि दृश्येत कारणेऽस्यापि संभवात् ॥५
शुद्धानुभव विविध आकारों द्वारा अपने आकार का परित्याग नहीं कर देता बल्कि
१-३. उत्पलदेवाचार्य । ४-५. स्पन्दप्रदीपिका ।