स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० स्पन्दकारिका
एक ही आत्मा के तीन भेद है किन्तु उनमें चैतन्य एक ही है ।
बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः ।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ (माण्डूक्योप०)
१. 'विभुविश्व' = बहिष्प्रज्ञ २. 'तैजस' = अन्तःप्रज्ञ ३. 'प्राज्ञ' = घनप्रज्ञ । विश्व
का स्थान = दक्षिणनेत्र । तैजस = मन के भीतर । प्राज्ञ = हृदयाकाश में । (एक ही
आत्मा शरीर में ३ प्रकार से स्थित है) 'विश्व' = स्थूलभुक् । तैजस—सूक्ष्मभुक् । प्राज्ञ =
आनन्दभुक् । इनको जानने वाला ज्ञाता भोगों को भोगते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता ।
आत्मा का तुरीय स्वरूप— 'तुरीय' का स्वरूप क्या है?— 'नान्तः प्रज्ञं न
बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्य-
मव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स
विज्ञेयः ॥' ('माण्डूक्योपनिषद') ।
विश्व और तैजस— स्वप्न एवं निद्रा से आच्छादित । 'प्राज्ञ' = स्वप्नशून्य किन्तु
सनिद्र । तुरीय— न निद्रा न स्वप्न । स्वप्नावस्था—अन्यथा गृह्णतः स्वप्नो ॥ (अन्यथा
ग्रहण) । निद्रावस्था—निद्रातत्त्वमजानतः ॥ (तत्त्व का अज्ञान)
स्वप्न + निद्रा दोनों का अन्त = तुरीय पद ॥
जो आत्मा विभिन्न अवस्थाओं में अवस्थित रहने के कारण भिन्नात्मक दृष्टिगोचर
होती है उसे तात्विक दृष्टि से अभिन्न एवं अद्वैतभाव से देखने वाले ही परमार्थदर्शी हैं—
एतैरेषोऽपृथग्भावैः पृथगेवेति लक्षितः ।
एवं यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशंकितः ॥ (मा० का०)
तुर्यपद तो अहंविमर्शात्मक शाक्तभूमिका है । स्थायी अवस्थान प्राप्त करने पर यही
तुर्यातीत पूर्णशिवभाव है । स्पन्द दार्शनिक इसी तुर्यपद शाक्तभूमिका प्राप्त करने पर बल
देकर शिवभाव तक ले जाने का प्रयास करते हैं । तुर्य + तुरीयातीत = निर्विकल्प
चिद्घन अवस्थायें । इसमें भेदकल्पना की संभावना नहीं । चिद्घनावस्था सततोदीयमान
रहने के कारण शाश्वत जागरण की अवस्था है ।
साधना-स्तर पर सांसारिकों की जागरण, स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्थायें—
ध्यान, धारणा एवं समाधि की अवस्थायें हैं ।
शङ्कराचार्य कहते हैं— 'निद्रा समाधि-स्थितिः' ।
आराधना— यद् यद् कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम्' ।
प्रदक्षिणा— संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः ।
अपनी वार्ता— 'स्तोत्राणि सर्वागिरो'
अपनी आत्मा—शिव । अपनी बुद्धि = पार्वती ।
शिवसूत्रकार ने भी— 'कथा जपः, 'उद्यमो भैरवः, 'ज्ञानं जाग्रत' 'स्वप्नो
विकल्पः ।' अविवेको माया सौषुप्तम् । इच्छा शक्तिः उमा कुमारी, 'दृश्यं शरीरं, 'वितर्क
आत्मज्ञानम्, 'चितं मन्त्रः', 'प्रयत्नः साधकः । 'विद्या शरीरसत्ता मन्त्र रहस्यम्, 'शरीरं