सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

७४ स्पन्दकारिका
का सत्य व्यावहारिक है तथापि जीव एवं जगत् ब्रह्म से कोई पृथक् स्वतन्त्र तत्त्व नहीं है।
शांकर दृष्टि में ब्रह्म और जगत् की एकता—१. यह सम्पूर्ण विश्व जो अज्ञान
के कारण नानात्मक प्रतीत हो रहा है समस्त भावनाओं के दोषों से रहित (निर्विकल्प)
ब्रह्म ही है—जगत् ('रज्जौ यथाऽहेर्भ्रमः' भी है) भ्रम भी है किन्तु ब्रह्म से पृथक् स्वतन्त्र
सत्ता भी नहीं है।
'यदिदं सकलं नानारूपं प्रतीतमज्ञानात्।
तत्सर्वं ब्रह्मैव प्रत्यस्तराशेषभावनादोषम् ॥'
२. मृत्तिका का कार्य होने से घट उससे पृथक् नहीं हो सकता क्योंकि सब ओर से
मृत्तिका रूप होने के कारण घट का रूप मृत्तिका से पृथक् नहीं है अतः मृत्तिका में मिथ्या
कल्पित नाममात्र घर की सत्ता ही कहाँ है?१
आचार्य शङ्कर का जगन्मिथ्यात्ववाद—
मृत्कार्यभूतोऽपि मृदो न भिन्नः, कुंभोऽस्ति सर्वत्र मृत्स्वरूपात् ।
न कुंभरूपं पृथगस्ति कुंभः, कुतो मृषा कल्पितनाममात्रः ॥
३. मृत्तिका से घट का रूप कोई दिखा नहीं सकता। अतः घट तो मोह से
कल्पित है। वस्तुतः सत्यात्मक तो मृत्तिका मात्र है।२
सत्-ब्रह्म का कार्य यह सकल प्रपञ्च सत्स्वरूप ही है क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत्
वही तो है उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। जो कहता है कि उससे पृथक् भी कुछ है उसका
मोह दूर नहीं हुआ है एवं उसका यह कथन सुषुप्त पुरुष के प्रलाप के सदृश है—
१. केनापि मृद्भिन्नतया स्वरूपं, घटस्य संदर्शयितुं न शक्यते ।
अतो घटः कल्पित एव मोहान्मृदेव सत्यं परमार्थभूतम् ॥
२. सद्ब्रह्म सकलं सदैव, तन्मात्रमेतन्न ततोऽन्यदस्ति ।
अस्तीति यो वक्ति न तस्य मोहो, विनिर्गतो निद्रितवत्प्रजल्पः ॥
'यह संपूर्ण विश्व ब्रह्म ही है' ऐसा अति श्रेष्ठ अथर्व श्रुति कहती है अतः यह
विश्व ब्रह्ममात्र ही है क्योंकि अधिष्ठान से आरोपित वस्तु की पृथक् सत्ता हो ही नहीं
सकती।३
'यदि यह जगत् सत्य हो तो आत्मा की अनन्तता में दोष आता है और श्रुति
अप्रामाणिक हो जाती है एवं ईश्वर भी मिथ्यावादी ठहरते हैं। ये तीनों बातें सत्पुरुषों के
लिए शुभ नहीं है।
'यदि विश्व सत्य होता तो सुषुप्ति में भी उसकी प्रतीति होनी चाहिए थी किन्तु उस
समय इसकी कुछ भी प्रतीति नहीं होती अतः यह स्वप्नवत् असत एवं मिथ्या है—४
१. ब्रह्मैवेदं विश्वमित्येव वाणी, श्रोती ब्रूतेऽथर्वनिष्ठा वरिष्ठा ।
तस्मादेतद् ब्रह्ममात्रं हि विश्वं, नानाधिष्ठानाद्भिन्नतारोपितस्य ॥
१-४. विवेक चूड़ामणि।