सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 173

७२ स्पन्दकारिका
'सेयं स्वातन्त्र्यशक्त्यात्मा स्वपरामर्शविग्रहा' । १
'मालिनीवार्तिक' में अभिनवगुप्त कहते हैं कि परमात्मा की मुख्य शक्ति तो मात्र
'स्वातन्त्र्यशक्ति' है—'स्वतन्त्र इति तस्येच्छाशक्तिः स्वातन्त्र्यसंज्ञिता । स्वतन्त्र परमात्मा
की इच्छा ही 'स्वातन्त्र्य' है। वह परमेश्वर में विश्रान्त है। उसकी 'स्वातन्त्र्यमहिमा' शिव
के स्वस्वरूप से अपृथक् रूप में स्थित है—'स्वातन्त्र्यमहिमा वास्य स्वरूपादपृथक्स्थितिः'
उसका 'स्वातन्त्र्य' है क्या? परमेश्वर का अपने में ही 'प्रोच्छलत्स्थिति' ही उसका
स्वातन्त्र्य हैं— 'तत्स्वातन्त्र्यात्स्वतन्त्रं तत्स्वात्मनि प्रोच्छलत्स्थितम्' । २
यह शक्ति विश्वरूपिणी है—
'देशकालक्रियाकारकल्पनापथवर्जितः ।
देवदेवस्तथैवास्य शक्तिः सा विश्वरूपिणी ॥' ३
यह स्वतन्त्र महेश्वर ही 'विश्वात्मा' है—
एवं महेश्वरो देवो विश्वात्मत्वेन संस्थितः ॥ (२।१) ४
'स्वातन्त्र्यशक्ति' द्वारा जो 'स्वात्मप्रच्छादन क्रीड़ा' निष्पादित की जाती है वह
'मल' के नाम से प्रसिद्ध है—
स्वात्मप्रच्छादनक्रीडामात्रमेव 'मलं' विदुः ॥५
किन्तु इस स्वातन्त्र्यशक्ति से दीक्षा एवं भुक्ति भी निष्पादित होती है।
संविदश्च स्वस्वातन्त्र्यायास्तथारूपावभासनम् ।
दीक्षेति किल मन्तव्यं मुच्यन्ते जन्तवो यया ॥६
इसी शक्ति में विश्रान्त साधक ही मुक्त कहा जाता है—
'तत्र विश्रान्तिमापन्नो मुक्त इत्यभिधीयते ॥' ७
जीव एवं परमात्मा की स्वरूप-कल्पना—(केवलाद्वैतवाद के सिद्धान्त)
सिद्धान्त—१. 'प्रतिबिम्बवाद', २. 'अवच्छेदवाद', ३. 'जीवैक्यवाद', ४. 'आभासवाद'।
१. प्रतिबिम्बवाद—
अज्ञान में प्रतिबिम्बित चैतन्य को 'ईश्वर' एवं 'बुद्धि' में प्रतिबिम्बित चैतन्य को
'जीव' कहते हैं किन्तु अज्ञान की उपाधि से रहित बिम्ब शुद्ध चैतन्य है। (संक्षेपशारीरक)
स्वातन्त्र्यादि गुणों से विशिष्ट होने के कारण ईश्वर 'बिम्ब' स्थानापन्न है एवं
परमात्मा के कारण अविद्या में चिदाभास जीव है (विवरणकार) ॥ अर्थात् ईश्वर
बिम्बरूप है एवं जीव प्रतिबिम्बरूप है यही है—'प्रतिबिम्बवाद' ।
इस सिद्धान्त में अनेक वेदान्तियों को अरुचि है । समस्त प्रतिबिम्ब स्थलों में
प्रायः रूपवान् पदार्थ का रूपवान् आधार में ही प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है यथा—
१. परात्रिंशिकातात्पर्यदीपिका । २-७. मालिनीवार्तिक ।