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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 519 में से

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पृष्ठ 148

प्रथमः निष्यन्दः ४७
जो संविद्रूपा सामान्य स्पन्द है वह समस्त प्रमेयों की समष्टि रूप विश्व के पदार्थ
में प्रवहमान है । संसार अनेकत्व एवं शिव के एकत्व परस्पर विरोधी तत्त्व हैं फिर
अनेकत्व (विश्व) का एकत्व (शिव) के साथ सामञ्जस्य या अद्वैत अभेद कैसा?
(१) शिव का स्वभाव = एकत्व । = ‘प्रमाता’
(२) प्रमेय रूप जगत् का स्वभाव—अनेकत्व = ‘प्रमेय’
यह प्रमेयगत अनेकाकारता, अहं विमर्श की एकाकारता में अनादिकाल से अभि-
न्नतया अन्तर्निहित है । चूँकि विमर्शगत वस्तु का ही बाह्यावभासन संभव हो पाता है—
अतः अनेकाकारता का बाह्यावभासन तो हो जाता है किन्तु किसी नव्य वस्तु का प्रादुर्भाव
नहीं होता ॥
भासमान अनेकता में भी एकत्व रूप परमात्मा तो एक ही है—
‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ॥’१
वह आत्मा एवं महेश्वर विश्व को अनेकात्मक नहीं अपने अहं से अभिन्न मानकर
एक मानता है अतः अनेकता कहाँ है?—
‘विश्वरूपोऽहमदमित्यखण्डामर्शबृंहितः ॥’
(स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ॥)२
अनेकता तो स्वस्वरूप के अपरिज्ञान के कारण है—
‘स्वस्वरूपापरिज्ञानमयोनिकः पुमान्मतः ॥’३
प्रकाशविमर्शमय, उन्मेष-निमेषमयी स्पन्द शक्ति से समवेत शिव ही परम चैतन्य
है—चैतन्य का समुद्र है । चेतन वह है जो अपने को एवं पराये दोनों को जानता हो,
और विभिन्न संवेदनाओं से युक्त हो । ‘शङ्कर’ प्रकाशविमर्शमय होने के कारण अपने
स्वस्वरूप को और ‘विश्वोऽहं' 'विश्वरूपोऽहं' ‘इदमहं’ ‘अहमिदं’ के रूप में अपनी शक्ति
के स्फार को (अर्थात् विश्व को अपनी अभिव्यक्ति के रूप में) विश्वात्मक रूप में देखता
हो—वही शङ्कर है ।
(शिव का स्वस्वरूप = शक्ति का प्रसार = विश्व ।)
‘चैतन्य’, ‘आत्मा’ और ‘शङ्कर’—शिव अपनी शक्ति विराट् प्रसार रूप विश्व
को अहं के रूप में विमर्शित करता है । यह विश्व का अहमात्मक विमर्शन—विश्व की
अहं-रूप में अनुभूति—(विमर्श की क्रिया) शिव की स्वातन्त्र्य शक्ति ही है । शिव की
यह ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’ ही ‘चैतन्य’, ‘विमर्श’, ‘हृदय’, ‘संवित्’ ‘ऊर्मि’, ‘चितिशक्ति’
आदि कहलाती है ।
यह स्वतन्त्र चैतन्य सत्ता ही विश्व की आत्मा है, विश्व का हृदय है, अस्तित्वों का
प्राण है । शङ्कर का स्वभाव यह है कि वह स्वतन्त्र ज्ञाता एवं स्वतन्त्र कर्ता है ।
स्वातन्त्र्य ही उसकी मुख्य शक्ति है । जो चेतन है वह आत्मा है, जो आत्मा है वह चेतन
१-३. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेव ।