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सर्वकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 190 में से

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पृष्ठ 53

स्पन्दशक्ति का पारमार्थिक अस्तित्व ४३
इत्यादि अवस्थायें स्वरूप से इतर अन्य कोई पदार्थ नहीं हैं। १यह तो अखण्ड—ज्ञानरूपा
पारमेश्वरी शक्ति है जो कि आन्तर और बाह्य रूप में प्रकाशमान, नील सुख इत्यादि वेद्य
पदार्थों के रूप में स्वयं ही प्रकाशमान है। प्रतिसमय संसार में देखा जाता है कि प्रत्येक
प्रमाता ज्ञान के द्वारा ही इन नील सुखादि विषयों का अनुभव करता है, अर्थात् ज्ञान-सत्ता
के आधार के बिना किसी भी विषय की कोई सत्ता नहीं है। इससे यह बात स्पष्ट होती हैं
कि जो जिसके बिना अलग रूप में स्थित नहीं रह सकता वह उससे अभिन्न हुआ करता है।
२फलतः नील सुखादि भी ज्ञान से इतर अन्य कोई पदार्थ नहीं हैं। यदि यह अवस्थायें ज्ञानरूप
हैं तो हैं, यदि नहीं हैं तो नहीं हैं। जिसप्रकार यदि मिट्टी है तो घट है यदि मिट्टी नहीं है
तो घट भी नहीं है।
इस सम्बन्ध में यह बात स्मरणीय है कि चित्-तत्त्व का स्वरूप विश्वात्मक अहंविमर्श
है। इस अहंविमर्श के दो रूप हैं—शुद्ध तथा अशुद्ध। शुद्ध का सम्बन्ध पतिप्रमातृभाव के
साथ है। इसमें सारी अवस्थायें और सारे विरोधात्मक द्वन्द्व अपनी भेदमयता को भूल कर
विशुद्ध चिद्रूप एकाकारता में उसी प्रकार अवस्थित रहते हैं जिस प्रकार संसार की सारी
सरितायें सागर में पहुँच कर सरितायें न रह कर सागर ही बन जाती हैं। अशुद्ध अहं-
विमर्श (माया शक्ति के द्वारा संकोच में पड़ी हुई 'मैं' प्रतीति) का सम्बन्ध संसारी जीव अथवा
पशु-प्रमातृभाव के साथ है। यह वह अवस्था है जिसमें वही विशुद्ध चित्-३तत्त्व, अपने
ही रूपान्तर मायाशक्ति के द्वारा, अपनी ही अभिन्न ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और माया-
शक्ति को संकोच में डाल कर क्रमशः४ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण (बुद्धि, मनस् और
अहंकार) के समष्टिरूप चित्त के रूप को धारण कर लेता है। यह चित्त ही प्रत्येक प्रकार की
अवस्थाओं, उपाधियों, उनके पारस्परिक विरोधात्मक द्वन्द्वों, विचित्र प्रकार के शरीरों एवं
आकार-प्रकारों की अनेकाकारता की सर्जना करके उनको अपना वास्तविक स्वरूप समझता
रहता है जबकि वास्तविक स्थिति कुछ और है।
फलतः विशुद्ध चित्-तत्त्व प्रतिसमय अखंड ज्ञानात्मक एकाकारता होने के कारण इन
सारी सुखिता, दुःखिता, ग्राह्यता और ग्राहकता की उपाधियों से रहित और परमार्थसत्
है। अब जो पशु प्रमातृ-भाव की पदवी पर प्रत्येक जीवधारी में इन उपाधियों के प्रति 'अहं'
१. तत्तद्रूपतया ज्ञानं बहिरन्तः प्रकाशते ।
ज्ञानादृते नार्थसत्ता ज्ञानरूपं ततो जगत् ॥
(का० क्र० उदाहृत शि० सू० वि०, सू० ३०)
२. नहि ज्ञानादृते भावाः केनचिद्विषयीकृताः ।
ज्ञानं तदात्मतां यातमेतस्मादवसीयते ॥ (तत्रैव)
३. चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् । (प्र० हृ०, ५)
४. स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या ।
मायातृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस्तमः ॥ (ई० प्र०, ३-२-४)