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सर्वकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 190 में से

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पृष्ठ 48

३८ स्पन्दकारिका
इस सारे कथन का निष्कर्ष इस प्रकार है—'मैं' प्रतीति से अनुमेय और सुख-दुःख
इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट वस्तु ही आत्मा है। इससे इतर कोई नित्य और स्वप्रकाश
आत्मा नहीं है।
३. चार्वाकों का देहात्मवाद—अनात्मवादी दार्शनिकों में चार्वाकों का स्थान प्राचीन
भी है और महत्त्वपूर्ण भी। प्राचीन भारत में इनको लोकायतिक भी कहते थे।
इनका मन्तव्य है कि शरीर से इतर आत्मा नामक किसी वस्तु का अस्तित्व मानना
सच्चाई की आँखों में धूल झोंकने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी
हूँ' इत्यादि अनुभवों में सुखिता और दुःखिता इत्यादि का सम्बन्ध चेतन शरीर के साथ ही
है क्योंकि प्रत्यक्ष रूप में यही देखने में आता है। जो प्रत्यक्ष हो वही सत्य है। जो प्रत्यक्ष नहीं
उसके विषय में अनुमान आदि के बटेर उड़ाना मूर्खों का काम है।
१चार्वाक लोग शरीर को ही चेतन आत्मा मानने के पक्ष में तीन प्रमाण प्रस्तुत
करते हैं—
१. जब तक शरीर रहता है (जीर्ण नहीं हो जाता है) तब तक ही चैतन्य भी रहता
है। चैतन्य शरीर के साथ ही आता है और उसी के साथ जाता भी है। अन्नपान
से चेतना (शरीररूप) वृद्धि पाती है और उसके अभाव में उसका ह्रास हो जाता है। अतः
शरीर ही चेतन है।
२. 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं भूखा हूँ' इत्यादि अनुभवों के ज्ञान, शरीर की
ओर ही संकेत करते हैं क्योंकि सुखी, क्षीण इत्यादि शरीर ही हो जाता है और कोई नहीं।
३. चैतन्य और भौतिक पदार्थों का पारस्परिक सम्बन्ध शाश्वत और यथार्थ है
क्योंकि जो कुछ जिस रूप में देखने में आता है वही सत्य है।
अब प्रश्न केवल इतना ही है कि इन भौतिक पदार्थों में चेतना२ का उदय कहाँ से
होता है ? इस विषय में चार्वाकों का कथन है कि प्रत्यक्षरूप में जड़ दिखाई देने वाले पृथिवी,
जल, तेज और वायु इन चार महाभूतों के आकस्मिक और किसी निश्चित नियम के अनु-
सार सम्मिश्रण से स्वयं ही चैतन्य की उत्पत्ति हो जाती है और उस सम्मिश्रण का लोप
हो जाने पर इसका भी लोप देखने में आता है। भूतों के सम्मिश्रण से ही शरीर की भी
उत्पत्ति हो जाती है अतः स्वयं ही चैतन्ययुक्त शरीर उत्पन्न हो जाता है और मरने पर उस
शरीर के चैतन्य का भी उसी के साथ नाश हो जाता है।३ सृष्टि और संहार, जगत् का
अपना ही स्वभाव है। इसमें ईश्वर का कोई हाथ नहीं है। वास्तव में ईश्वर नामक पदार्थ
है ही नहीं। अतः जो कुछ है वह शरीर ही है। इसी की आयु बढ़ाने का और इसी को
सुखमय बनाने का उपक्रम करना ही जीवन का महत्त्वपूर्ण कार्य है। खाओ, पीओ और
मौज उड़ाओ। धर्म कुछ भी नहीं है। धन और काम ही जीवन के परम लक्ष्य हैं। मुक्ति
की कल्पना झूठी है। मरना ही मुक्ति है।

१. तत्रैव, ८१ पृष्ठ .
२. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृ० ८१.
३. तत्रैव, पृष्ठ ८२.